Friday, May 4, 2012

भक्त प्रह्लाद जी

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की "चतुर्दशी को नरसिंह जयंती" के रूप में मनाते है.इस दिन भगवान ने नरसिंह अवतार लेकर प्रहलाद की रक्षा कि थी और हिरण्यकश्यपु का वध किया था.

पूजा कि विधि - इस तिथि पर व्रत रहकर मध्यान्ह के समय वैदिक मंत्रो के उच्चारण से स्नान करना चाहिये भगवान नरसिहं शक्ति और पराक्रम के देवता है पूजा के स्थान को गोवर से लीपकर कलश में ताम्बे इत्यादि डालकर उसमे अष्टदल कमल बनाना चाहिये फिर शक्ति के अनुसार गोदान तिल स्वर्ण वस्त्र दान करना चाहिये.  

नरसिंहदेव कथा - श्री कश्यप की पत्नी दिति से दो पुत्र उत्पन्न हुए - हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु. दोनों बड़े क्रूर थे, एक बार जब हिरण्याक्ष पृथ्वी को रसातल में ले गया तब भगवान ने वराह अवतार लेकर उस राक्षस का वध किया. और पृथिवी को रसातल से बाहर ले आये जब उसके भाई हिरण्यकश्यपु को यह पता चला तो वह बहुत क्रोधित हुआ. और वह भगवान विष्णु से द्वेष करने लगा. उसे पता था की विष्णु भगवान बहुत बलशाली है इसलिए उसने उन्हें हराने के लिए ब्रह्मा जी की तपस्या शुरू कर दी.

और बहुत बरसो तक तपस्या करता रहा. उधर इंद्र ने हिरण्याकश्यपु से बदला लेने के लिए उसकी पत्नी कयादु को उसके महलों से उठाकर लाया,जब वह रास्ते में था. तो नारद जी ने रोका और कहा- कि इंद्र ये तुम क्या कर रहे हो? किसी की पत्नी का इस तरह उसके पीछे हरण करना सही नहीं है, और नारदजी कयादु को लेकर अपने आश्रम में चले गए.

कयादु आश्रम में रहने लगी,कयादु उस समय गर्भवती थी. नारदजी ने कहा- जब तक तुम्हारे पति तपस्या से वापस नहीं आ जाते तब तक तुम आश्रम में रहो, आश्रम में रोज श्री हरि की कथा होती, हरि नाम का संकीर्तन होता, कयादु बहुत ध्यान से कथा सुनती, कीर्तन करती, उनका सारा समय इसी प्रकार से बीतेने लगा,समय बीतने पर कयादु ने एक बेटे को जन्म दिया नारद जी ने बेटे का नाम "प्रहलाद" रखा, प्रहलाद को जन्म से पहले ही सत्संग मिला था,अपने माँ के गर्भ में ही भगवान से प्रीति हो गई थी, इसलिए पाँच वर्ष की उम्र में ही उन्हे बहुत ज्ञान  था, श्री हरि के भक्त थे, दिन हो या रात बस उन्हें केवल भगवान की भक्ति से ही काम था. 

उधर हिरण्याकश्यपु के तप से ब्रम्हा जी प्रसन्न हो गए, और उसे वरदान देने के लिए प्रकट हो गए,हिरण्याकश्यपु ने अमरता का वरदान माँगा. ब्राम्हा जी ने कहा- दुनिया में अमर कोई भी नहीं हो सकता, क्योकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है,

तब हिरण्याकश्यपु ने कहा - तो ठीक है ब्रम्हा जी मुझे वरदान दीजियेगा, कि में न दिन में मरू, न रात में, न सुबह मरू न शाम को, न आकाश में मरू, न धरती पर, न किसी अस्त्र से मरू, न शस्त्र से, न नर से मरू, न पशु-पंछी से,  देव से मरू, न दानव से,  न बारह महीनों में किसी में मरू. ब्रम्हा जी ने वरदान दे दिया.

हिरण्याकश्यपु अपने को अमर समझ कर अपने महलो में आ गया और सारे राज्य में श्री हरि की पूजा बंद कर दी,और स्वंय की पूजा कराने लगा, पर उनके अपने महलों में ही हरि भक्त प्रहलाद जी थे जब हिरण्यकश्यपु को पता चला तो उसने बहुत प्रकार से प्रहलाद को समझाया पर वे नहीं माने.

एक दिन कयादु पति से बोली- प्रहलाद अब पाँच वर्ष के हो गये है,में देखती हूँ ,कभी तो रोते थे,कभी हँसते थे,कभी नाचते है, कभी ताली बजाते, कभी गाते थे.अब उन्हें पढने के लिए पाठशाला भेजना चाहिए, हिरण्याकश्यपु ने तुरंत गुरू शुक्राचार्य के पुत्र  संडा और आमर्क को के पास प्रहलाद को राक्षसी विद्या पढ़ने के लिए पाठशाला में भेज दिया, पर गुरू जी जो भी पढ़ाते उसकी जगह हरि नाम का कीर्तन करते और हरि नाम का ही उपदेश करते, जब  संडा और आमर्क उन्हें समझाते तो उन्हें भी हरि नाम कि महिमा बताते,इससे परेशान होकर उन्होंने प्रहलाद को एक कमरे में बंदकर दिया. 

एक दिन जब वे दोनों किसी काम से बाहर गए तो बाकि के बच्चों ने प्रहलाद को निकाल कर कहा - कि हमारे साथ खेलो, प्रहलाद जी ने कहा- में तो केवल एक ही खेल जानता हूँ तुम सब भी मेरे साथ खेलो, सब बोले - कौन सा खेल?

प्रहलाद जी ने कहा- मेरे गुरु का खेल, हरि कीर्तन, कुछ ही समय में सारे बच्चे भी हरि कीर्तन करने लगे. जब संडा और आमर्क वापस आये और सारे बच्चे भी हरि कीर्तन करते देखा तो उन्हें बहुत गुस्सा आया और वे प्रहलाद हिरण्याकश्यपु के पास ले गए और कहा - कि हम इसे नहीं पढ़ा सकते. और दोनों वापस चले गए.

हिरण्याकश्यपु ने पूछा- प्रहलाद तुम इतने दिनों पाठशाला में रहे, तुमने क्या सीखा हमें बताओ!

प्रहलाद जी ने कहा- पिताजी मेरे गुरुदेव ने जो मुझे सिखाया वो बताऊ या मेने जो सीखा वो बताऊ?

हिरण्याकश्यपु ने कहा- बेटा जो तुमने अपने मन से सीखा है वो बताओ?

प्रहलाद जी ने कहा - पिताजी !  "इस दुनिया में करोडो लोग जन्म लेते है और मर जाते है. सब को अपने-अपनेकर्मो के हिसाब से फल मिलता है, अच्छे कर्मो से स्वर्ग, बुरे कर्मो से नरक मिलता है. जब अच्छे-बुरे कर्म खत्म हो जाते है, तो वापस इसी पृथ्वी पर आना पड़ता है. हर एक प्राणी इसी प्रकार चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता हुआ अपने-अपने कर्मो को भोगता है,यहाँ कोई किसी का अपना नहीं, माता-पिता, भाई-बंधू,पत्नी-पुत्र, सभी एक झूठा सपना है. सगे तो केवल नारायण है कोई कहता है में सुखी हूँ, कोई कहता है- में दुखी हूँ पर वास्तव में व्यक्ति का सबसे बड़ा सुख केवल श्री हरि का नाम है.ये दो अक्षर का शब्द “हरि”में ही जीव का कल्याण है. उनके रूप का ही दिन-रात चिन्तन करने में ही इस निष्सार संसार से उद्धार है इसलिए प्रेम से कहिये-"जय श्री हरि,जय श्री हरि"

जो प्रह्लाद के मुख से अपने शत्रु का नाम सुना तो क्रोध में भर कर.हिरण्याकश्यपु ने कहा- अभी के अभी मेरे शत्रु का नाम छोड़ दे, नहीं तो अपने प्राण छोड़ना पड़ेगे. 

प्रहलाद जी ने कहा- पिता जी!  में अपने प्राण छोड़ दूँगा, पर श्री हरि का नाम नहीं छोड़ सकता. हिरण्याकश्यपु ने जब प्रहलाद की बाते सुनी तो तुरंत अपने सैनिको को बुलाया और प्रहलाद को मारने का आदेश दिया. सैनिको ने प्रहलाद को पहाड की चोटी से नीचे गिराया, जैसे ही प्रहलाद नीचे गिरे स्वयं भगवान ने अपने हाथो में झेल लिया, सर्पो से भारी कोठारी में बंद कर दिया,पर सर्पो ने कुछ भी नहीं किया,  हाथी के पैर के नीचे कुचलवाया,पर हाथी ने कुचले के वजह अपने ऊपर बैठा लिया खौलते तेल के कड़ाई में गिराया, तो तेल तुरंत फूल बन गए, जहर दिया, होलिका आग में लेकर बैठी, तो होलिया ही आग में जल गई पर प्रहलाद का कुछ भी नहीं हुआ,

इन सब से प्रहलाद को कुछ भी नहीं हुआ.हिरण्याकश्यपु ने अपनी तलवार निकाल ली और बोला- प्रहलाद अब मरने के लिए तैयार हो जा! बताओ कहा है तेरा विष्णु, इस तलवार में तेरा काल है, क्या इसमे में भी तेरा विष्णु है.

प्रहलाद जी ने कहा- पिताजी!   "मो मै तो मै, खडग खम्ब मै ,जहाँ देखो तहाँ राम" इस तलवार में, धरती में, आकाश में, इस पृथ्वी के कण-कण में श्री हरि है, पास लगे खम्बे को देखकर, हिरण्याकश्यपु ने कहा-  क्या इस खम्बे में भी तेरा भगवान है?

प्रहलाद जी ने कहा- जी! पिताजी,इस खम्बे में भी मेरा भगवान है झट हिरण्याकश्यपु ने तलवार से उस खम्बे पर प्रहार किया, खम्बे के टुकड़े-टुकड़े हो गये और खम्बे के बीचो-बीच से झूलता हुआ सिहांसन प्रकट हुआ और नरसिंह भगवान प्रकट हो गए,जिनका मुँख तो सिंह के समान था ,और शरीर नर के समान है,बड़े-बड़े नख थे, क्रोध से आँखे लाल-लाल हो रही थी झट भगवान हिरण्याकश्यपु पर लपक पड़े दोनों में युद्ध होने लगा.

भगवान ने हिरण्याकश्यपु की नस-नस ढीली कर दी,अंत में भगवान ने देहलीज पर बैठकर, हिरण्याकश्यपु को अपनी जंघाओं पर लिटा कर अपने नख से छाती चीरकर आँतो को निकालकर अपने गले में डाल ली, तभी  आकाशवाणी हुई, हे हिरण्याकश्यपु इस समय न दिन है न रात, संध्या का समय है, न आकाश है न धरती है, भगवान अपनी जंघाओं में लिए है, न किसी अस्त्र से, न किसी शस्त्र से, अपने नख से मार रहे है, न नर है न पशु-पंछी, नरर्सिंह है, देव है न दानव, बारह महीनों में कोई महीना नहीं, तेरहवा पुरुषोतम महीना है. 

इस तरह भगवान ने उसका प्राणान्तं कर दिया. सारे देवता भगवान की  स्तुति करने लगे. भगवान बहुत क्रोधित हुए और उनके मुख से आग निकलने लगी , उनका गुस्सा किसी भी तरह शांत नहीं हुआ, स्वयं लक्ष्मी जी भी उन्हें शांत नहीं कर सकी सबको समझ में नहीं आ रहा था कि भगवान शांत क्यों नहीं हो रहे, अंत मे सबने प्रह्लाद जी को आगे कर दिया, मानो बता रहे हो जिसने मेरे लिए इतने कष्ट सहे,जिसके लिए मै आया,आप सब देवताओ ने उसे तो पीछे कर दिया और आप सब मेरी स्तुति करने लगे इस लिए भगवान का क्रोध कम होने के वजह और बढ़ गया,

भगवानसिहांसन पर बैठे है, प्रह्लाद जी एक-एक सीढी चढ रहे है, और भगवान की स्तुति करते जा रहे है. जैसे-जैसे प्रह्लाद जी आगे बढ रहे है वैसे-वैसे भगवान शान्तं होते जा रहे है, प्रह्लाद जी को अपनी गोदी मे बैठाकर प्यार से जीभ से चाटने लगे मानो कह हो प्रह्लाद मुझे आने मे देर हो गई. और तेरे पिता हिरण्नायाकश्यपु ने मेरे कारण तुम्हे बहुत कष्ट दिए मुझे माँफ कर दो.

भगवान ने कहा- प्रह्लाद मुझसे कुछ माँग लो,

प्रह्लाद जी ने कहा- भगवान मुझे इस संसार कि कोई भी वस्तु नहीं चाहिए,केवल आपकी भक्ति ही चाहिए है. भगवान ने कहा-प्रह्लाद भक्ति तो मेंने तुम्हे दे ही दी पर इस के साथ मे तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ,

प्रह्लाद जी ने कहा -प्रभु यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते है, तो प्रभु मेरे पिता कि सद्गति हो. भगवान ने कहा- प्रह्लाद तुम अपने पिता की बात करते हो, मेने तो आज से तुम्हारी इक्कीस पीढिंया ही तार दी. इस तरह भगवान प्रह्लाद को दर्शन दे कर अपने लोक को गये, प्रहलाद ने अनेको वर्षों तक राज्य किया.

                                              
सार
इस कथा का सार ये है कि अगर विश्वास है, तो कण-कण मे भगवान है और हर परिस्थिती मे उन पर विश्वास करो भगवान प्रह्लाद के विश्वास पर नहीं हिरण्नायाकश्यपु के विश्वास पर आये थे. क्योकि प्रहलाद जी को तो भगवान को प्रकट करने की आवश्यकता ही नहीं थी उन्हें तो हर जगह दिखायी देते थे हिरण्नायाकश्यपु ने जब प्रह्लाद से पूँछा- कि कहा है तेरा भगवान, इस जलते हुए खम्बे मे भी है और जब प्रह्लाद उस खम्बे से लिपट गए तो हिरण्नायाकश्यपु को विश्वास हो गया कि इस खम्बे मे भगबान है, इसलिये भगवान खम्बे मे से प्रकट हो गए.                



Tuesday, February 21, 2012

शिवरात्रि का अर्थ



शिवरात्रि का अर्थ

वह रात्रि जिसका शिवतत्त्व से घनिष्ठ संबंध है । भगवान शिव की अतिप्रिय रात्रि को शिव रात्रि कहा जाता है । शिव पुराण के ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए-
फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥

महाशिवरात्रि का महत्त्व तीन कथाएं इस पर्व से जुड़ी हैं:-
  • एक बार मां पार्वती ने शिव से पूछा कि कौन-सा व्रत उनको सर्वोत्तम भक्ति व पुण्य प्रदान कर सकता है? तब शिव ने स्वयं इस शुभ दिन के विषय में बताया था कि फाल्गुन कृष्ण पक्ष के चतुर्दशी की रात्रि को जो उपवास करता है, वह मुझे प्रसन्न कर लेता है। मैं अभिषेक, वस्त्र, धूप, अर्ध्य तथा पुष्प आदि समर्पण से उतना प्रसन्न नहीं होता, जितना कि व्रत-उपवास से।
  • इसी दिन, भगवान विष्णु व ब्रह्मा के समक्ष सबसे पहले शिव का अत्यंत प्रकाशवान आकार प्रकट हुआ था। ईशान संहिता के अनुसार – श्री ब्रह्मा व श्रीविष्णु को अपने अच्छे कर्मों का अभिमान हो गया इससे दोनों में संघर्ष छिड़ गया । अपना महात्म्य व श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए दोनों आमादा हो उठे । तब श्रीशिव ने हस्तक्षेप करने का निश्चय किया, चूंकि वे इन दोनों देवताओं को यह आभास व विश्वास दिलाना चाहते थे कि जीवन भौतिक आकार-प्रकार से कहीं अधिक है। श्रीशिव एक अग्नि स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए । इस स्तम्भ का आदि या अंत दिखाई नहीं दे रहा था । श्रीविष्णु और श्रीब्रह्मा ने इस स्तम्भ के ओर-छोर को जानने का निश्चय किया । श्रीविष्णु नीचे पाताल की ओर इसे जानने गए और श्रीब्रह्मा अपने हंस वाहन पर बैठ ऊपर गए वर्षों यात्रा के बाद भी वे इसका आरंभ या अंत न जान सके । वे वापस आए, अब तक उनक क्रोध भी ग़लत हो चुका था तथा उन्हें भौतिक आकार की सीमाओं का ज्ञान मिल गया था । जब उन्होंने अपने अहम् को समर्पित कर दिया, तब श्रीशिव प्रकट हुए तथा सभी विषय वस्तुओं को पुनर्स्थापित किया । शिव का यह प्राकट्य फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को ही हुआ था । इसलिए इस रात्रि को महाशिवरात्रि कहते हैं ।
  • इसी दिन भगवान शिव और आदि शक्ति का विवाह हुआ था । भगवान शिव का ताण्डव और भगवती का लास्यनृत्य दोनों के समन्वय से ही सृष्टि में संतुलन बना हुआ है, अन्यथा ताण्डव नृत्य से सृष्टि खण्ड- खण्ड हो जाये । इसलिए यह महत्त्वपूर्ण दिन है।

शिवरात्रि कैसे मनाएं?
  • रात्रि में उपवास करें । दिन में केवल फल और दूध पियें।
  • भगवान शिव की विस्तृत पूजा करें, रुद्राभिषेक करें तथा शिव के मन्त्र
देव-देव महादेव नीलकंठ नमोवस्तु ते । कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तब ॥ तब प्रसादाद् देवेश निर्विघ्न भवेदिति । कामाद्या: शत्रवो मां वै पीडांकुर्वन्तु नैव हि॥ का यथा शक्ति पाठ करें और शिव महिमा से युक्त भजन गांए ।
  • ‘ऊँ नम: शिवाय’ मन्त्र का उच्चारण जितनी बार हो सके, करें तथा मात्र शिवमूर्ति और भगवान शिव की लीलाओं का चिंतन करें ।
शिवरात्रि या शिवचौदस नाम क्यों?


भूतेश्वर महादेव मन्दिर, मथुराBhuteshwar Mahadev Temple, Mathura
  • फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की महादशा यानी आधी रात के वक़्त भगवान शिव लिंग रूप में प्रकट हुए थे, ऐसा ईशान संहिता में कहा गया है । इसीलिए सामान्य जनों के द्वारा पूजनीय रूप में भगवान शिव के प्राकट्य समय यानी आधी रात में जब चौदस हो उसी दिन यह व्रत किया जाता है ।
शिव पूजा में बिल्व पत्र का महत्त्व- बेल (बिल्व) के पत्ते श्रीशिव को अत्यंत प्रिय हैं। शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है। एक बार उसे जंगल में देर हो गयी , तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया । जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची- वह सारी रात एक-एक कर पत्ता तोडकर नीचे फेंकता जाएगा । कथानुसार, बेलवृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था । शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख, शिव प्रसन्न हो उठे । जबकि शिकारी को अपने शुभ कृत्य का आभास ही नहीं था । शिव ने उसे उसकी इच्छापूर्ति का आशीर्वाद दिया। यह कथा न केवल यह बताती है कि शिव को कितनी आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है, बल्कि यह भी कि इस दिन शिव पूजन कितना महत्त्वपूर्ण है।

शिवलिंग मंदिरों में बाहर क्यों?जनसाधारण के देवता होने से, सबके लिए सदा गम्य या पहुँच में रहे, ऐसा मानकर ही यह स्थान तय किया गया है । ये अकेले देव हैं जो गर्भगृह में भक्तों को दूर से ही दर्शन देते हैं । इन्हें तो बच्चे-बूढे-जवान जो भी जाए छूकर, गले मिलकर या फिर पैरों में पड़कर अपना दुखड़ा सुना हल्के हो सकते हैं । भोग लगाने अर्पण करने के लिए कुछ न हो तो पत्ता-फूल, या अंजलि भर जल चढ़ाकर भी खुश किया जा सकता है ।जल क्यों चढ़ता है?रचना या निर्माण का पहला पग बोना, सींचना या उडेलना हैं । बीज बोने के लिए गर्मी का ताप और जल की नमी की एक साथ जरुरत होती है । अत: आदिदेव शिव पर जीवन की आदिमूर्ति या पहली रचना, जल चढ़ाना ही नहीं लगातार अभिषेक करना अधिक महत्त्वपूर्ण होता जाता है । सृष्टि स्थिति संहार लगातार, बार – बार होते ही रहना प्रकृति का नियम है। अभिषेक का बहता जल चलती, जीती-जागती दुनिया का प्रतीक है।

माघ पूर्णिमा


हमारे शास्त्रों में माघ पूर्णिमा की बड़ी भारी महिमा बताई गयी है... माघ पूर्णिमा को पृथ्वी का दुर्लभ दिन माना गया है... ब्रह्मवैवर्तपुराण में उल्लेख है कि माघी पूर्णिमा पर स्वयं भगवान नारायण गंगाजल में निवास करतें है । इस पावन घड़ी में कोई गंगाजल का स्पर्शमात्र भी कर दे तो उसे बैकुण्ठ की प्राप्ति होती है ।

इस दिन सूर्योदय से पूर्व जल में भगवान का तेज मौजूद रहता है, देवताओं का यह तेज पाप का शमन करने वाला होता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व जब आकाश में पवित्र तारों का समूह मौजूद हो उस समय नदी में स्नान करने से घोर पाप भी धुल जाते हैं। माघ पूर्णिमा के विषय में कहा जाता है कि जो व्यक्ति तारों के छुपने के पूर्व स्नान करते हैं उन्हें उत्तम फल की प्राप्ति होती है। जो तारों के छुपने के बाद पर सूर्योदय के पूर्व स्नान करते हैं उन्हें माध्यम फल की प्राप्ति होती।

इसलिऐ इस पावन पर्व पर "ओम नमः भगवते वासुदेवाय नमः" का जाप करते हुए स्नान और दान करना चाहिए । माघ पूर्णिमा के दिन स्नान करने वाले पर भगवान विष्णु कि असीम कृपा रहती है। सुख-सौभाग्य, धन-संतान कि प्राप्ति होती है इसलिए माघ स्नान पुण्यशाली माना गया है। पौराणिक मान्यता है कि कलयुग की शुरुआत माघ पूर्णिमा के दिन से ही हुई थी। इसलिए इस पूर्णिमा पर स्नान करने से कलियुग के सारे पाप धुल जाते हैं। साथ ही दान कर्म पुण्यदायी होता है।

इस दिन किए गए यज्ञ, तप तथा दान का विशेष महत्व होता है। गरीबो को भोजन, वस्त्र, गुड, कपास, घी, लड्डु, फल, अन्न आदि का दान करना पुण्यदायक होता है।

प्रयाग में माघ महीने को कल्पवास में बीताने की पंरपरा सदियों से चली आ रही है... जिसका विश्राम माघी पूर्णिमा के स्नान के साथ होता है । इसलिए इस दिन प्रयाग में स्नान करने से लाख गुणा फल की प्राप्ति होती है, क्योंकि यहां गंगा और यमुना का संगम होता है। गंगा नदी में स्नान करने से हजार गुणा फल की प्राप्ति होती है। अन्य नदियों और तालाबों में स्नान करने से सौ गुणा फल की प्राप्ति होती है। इस पुण्य दिवस पर अगर आप प्रयाग में स्नान नहीं कर पाते हैं तो जहां भी स्नान करें वहां पुण्यदायिनी प्रयाग का मन ही मन ध्यान करके स्नान करना चाहिए।

संगम स्थल पर एक मास तक कल्पवास करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए यह तिथि विशेष पर्व है। माघी पूर्णिमा को एक मास का कल्पवास पूर्ण हो जाता है। इस पुण्य तिथि को सभी कल्पवासी सुबह गंगा स्नान कर गंगा माता की आरती और पूजा करते हैं तथा अपनी-अपनी कुटियों में आकर हवन करते हैं। फिर साधु संन्यासियों तथा ब्राह्मणों एवं भिक्षुओं को भोजन कराकर स्वयं भोजन करते हैं। इस प्रकार विधि-विधान से पूजा-अर्चना, स्नान तथा दान करने के बाद कल्पवासी अपने घरों को जाते हैं।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय... ॐ नमः शिवाय...

क्यूं मनाते हैं मकर संक्रांति?


त्यौहार के देश का एक और त्यौहार है मकर संक्रांति. इस एक त्यौहार को देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नाम से बनाया जाता है. कहीं इसे मकर संक्रांति कहते हैं तो कहीं पोंगल लेकिन तमाम मान्यताओं के बाद इस त्यौहार को मनाने के पीछे का तर्क एक ही रहता है और वह है सूर्य की उपासना और दान. आज मकर संक्रांति है तो चलिए जानते हैं इस पर्व से जुड़ी कुछ विशेष बातें.


सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर-संक्रांति कहलाता है. संक्रांति के लगते ही सूर्य उत्तरायण हो जाता है. मान्यता है कि मकर-संक्रांति से सूर्य के उत्तरायण होने पर देवताओं का सूर्योदय होता है और दैत्यों का सूर्यास्त होने पर उनकी रात्रि प्रारंभ हो जाती है. उत्तरायण में दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं.


इस साल 15 को भी मनाई जाएगी संक्रांति?

माघ कृष्ण पक्ष की पंचमी षष्ठी शनिवार तदनुसार 14 जनवरी, 2012  ई. को संपूर्ण दिन और रात व्यतीत हो जाने के पश्चात सूर्य का मकर राशि में प्रवेश हो रहा है. अत: मकर संक्रांति पुण्यकाल 15 जनवरी, 2012 को सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक रहेगा. अस्तु खिचड़ी 15 जनवरी, 2012 को भी मनाई जाएगी.


महापर्व संक्रांति: पर्व एक रूप अनेक

सूर्य की मकर-संक्रांति को महापर्व का दर्जा दिया गया है. उत्तर प्रदेश में मकर-संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाकर खाने तथा खिचड़ी की सामग्रियों को दान देने की प्रथा होने से यह पर्व खिचड़ी के नाम से प्रसिद्ध हो गया है. बिहार-झारखंड एवं मिथिलांचल में यह धारणा है कि मकर-संक्रांति से सूर्य का स्वरूप तिल-तिल बढ़ता है, अत: वहां इसे तिल संक्रांति कहा जाता है. यहां प्रतीक स्वरूप इस दिन तिल तथा तिल से बने पदार्थो का सेवन किया जाता है.


मकर संक्रांति को विभिन्न जगहों पर अलग-अलग तरीके से मानाया जाता है. हरियाणा व पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है. उतर प्रदेश व बिहार में इसे खिचड़ी कहा जाता है. उतर प्रदेश में इसे दान का पर्व भी कहा जाता है.


असम में इस दिन बिहू त्यौहार मनाया जाता है. दक्षिण भारत में पोंगल का पर्व भी सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर होता है. वहां इस दिन तिल, चावल, दाल की खिचड़ी बनाई जाती है. वहां यह पर्व चार दिन तक चलता है. नई फसल के अन्न से बने भोज्य पदार्थ भगवान को अर्पण करके किसान अच्छे कृषि-उत्पादन हेतु अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं.


संक्रांति एक विशेष त्यौहार के रूप में देश के विभिन्न अंचलों में विविध प्रकार से मनाई जाती है.


स्नान का मान

कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करने पर सभी कष्टों का निवारण हो जाता है. इसीलिए इस दिन दान, तप, जप का विशेष महत्व है. ऐसा मान्यता है कि इस दिन को दिया गया दान विशेष फल देने वाला होता है.


मकर संक्रांति का ऐतिहासिक महत्व

माना जाता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते है. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है. महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं.


मकर-संक्रांति से प्रकृति भी करवट बदलती है. इस दिन लोग पतंग भी उड़ाते हैं. उन्मुक्त आकाश में उड़ती पतंगें देखकर स्वतंत्रता का अहसास होता है.

ऐसे शुरू हुई मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा


देश के कई भागों में मकर संक्राति के मौके पर नये चावल की खिचड़ी बनाकर सूर्य देव एवं कुल देवता को प्रसाद स्वरूप भेट करने की परंपरा है। लोग इस दिन एक दूसरे के घर खिचड़ी भेजते हैं और सुख शांति की कामना करते हैं। इस प्रथा के पीछे एक कारण यह है कि भारत कृषि प्रधान देश है। कृषि का आधार सूर्य देव को माना गया है। इसलिए सूर्य का आभार प्रकट करने के लिए नये धान से पकवान एवं खिचड़ी बनाकर सूर्य देवता को भोग लगाते हैं।

मकर संक्राति की खिचड़ी
खिचड़ी तो यू भी कई दिन घरों में बनती है लेकिन मकर संक्राति की खिचड़ी का स्वाद अनुपम होता है। मकर संक्राति की खिचड़ी नये चावल, उड़द की दाल, मटर, गोभी, अदरक, पालक एवं अन्य तरह की सब्जियों को मिलाकर तैयार की जाती है। इस खिचड़ी में आस्था का स्वाद भी मिला होता है जो अन्य दिनों की खिचड़ी में नहीं होता है। इस तरह सब्जियों को मिलाकर खिचड़ी बनाने की परम्परा की शुरूआत करने वाले बाबा गोरखनाथ थे। ऐसी मान्यता है कि बाबा गोरखनाथ भगवान शिव के अंश हैं। इसलिए इनके द्वारा शुरू की गयी परम्परा लोग श्रद्घा पूर्वक निभा रहे हैं।

बाबा गोरखनाथ की खिचड़ी
खिलजी के आक्रमण के समय नाथयोगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। ऐसे में गोरखनाथ बाबा ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी और इस व्यंजन को खिचड़ी नाम दिया। गोरखनाथ के प्रयास से खिलजी के आतंक से मुक्ति मिली और मकर संक्राति विजय दर्शन पर्व के रूप में जाना जाने लगा और खिचड़ी को विजय का प्रतीक माना गया। उसी समय से मकर संक्राति पर देवताओं को खिचड़ी अर्पित करके प्रसाद स्वरूप इसे खाने की प्रथा शुरू हुई। गोरखपुर में मकर संक्राति के दिन खिचड़ी मेला आरम्भ होता है। इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है इसके बाद लोगों में प्रसाद बॉटा जाता है।

Monday, January 16, 2012

Haldi


चम्मच भर हल्दी के फायदे: जानेंगे तो हैरान हो जाएंगे

मधुमेह रोगियों के लिए हल्दी किसी औषधी से कम नहीं है।
मधुमेह के रोगियों को प्रतिदिन गरम दूध में हल्दी चूर्ण मिलाकर पीना चाहिए।
हल्दी में वातनाशक गुण होते हैं जिससे मधुमेह की समस्या से निजात पाने में मदद मिलती है।

आयुर्वेद के अनुसार, यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है।

खून को साफ करती है।

महिलाओं की पीरियड से जुड़ी समस्याओं को भी दूर करती है।

लीवर संबंधी समस्याओं में भी इसे गुणकारी माना जाता है।

यही वजह है कि सर्दी-खांसी होने पर दूध में कच्ची हल्दी पाउडर डालकर पीने की सलाह दी जाती है। ।

पेट में कीड़े होने पर 1 चम्मच हल्दी पाउडर रोज सुबह खाली पेट एक सप्ताह तक ताजा पानी के साथ लेने से कीड़े खत्म हो सकते हैं। चाहें तो इस मिश्रण में थोड़ा नमक भी मिला सकते हैं।

चेहरे के दाग-धब्बे और झाइयां हटाने के लिए हल्दी और काले तिल को बराबर मात्रा में पीसकर पेस्ट बनाकर चेहरे पर लगाएं।

हल्दी-दूध का पेस्ट लगाने से त्वचा का रंग निखरता है और आपका चेहरा खिला-खिला लगता है।

खांसी होने पर हल्दी की छोटी गांठ मुंह में रख कर चूसें। इससे खांसी नहीं उठती।

त्वचा से अनचाहे बाल हटाने के लिए हल्दी पाउडर को गुनगुने नारियल तेल में मिलाकर पेस्ट बना लें। अब इस पेस्ट को हाथ-पैरों पर लगाएं। इसे त्वचा मुलायम रहती है और शरीर के अनचाहे बाल भी धीरे-धीरे हट जाते हैं।

बदलता बॉलिवुड


सेक्स, क्राइम और मसाला यह सब बॉलिवुड में पहले भी था पर इसके मिश्रण के साथ पहले इतने प्रयोग नहीं हुए जितने आजकल हो रहे हैं. पहले हीरोइन को अगर हीरो छू भी लेता था तो वह जुल्म हो जाता था जबकि अब तो हीरो-हिरोइन के बीच “सब” कुछ हो जाता है और फिर भी कहानी में कोई विशेष मोड़ नहीं आता. बीते जमाने में फिल्म के विलेन का काम दर्शकों को रुलाना और उन्हें डराना होता था पर अब तो विलेन कॉमेडी करता है. देखा कितना बदल रहा है बॉलिवुड.


साल 2011 ने भी बॉलिवुड को बदलने में विशेष योगदान दिया. इस साल बॉलिवुड ने कई बदलाव देखे. फिल्मों में बोल्डनेस को नया आयाम मिला तो वही गालियों ने फिल्मों में विशेष स्थान बनाया. आइए नजर डालें आखिर कैसे बदल रहा है बॉलिवुड.


गालियों ने भी बनाई जगह: साल 2011 से पहले फिल्मों में गालियां कभी-कभी सुनाई देती थीं और उस पर भी सेंसर बोर्ड बीप लगा देता था. पर इस साल गालियां ना सिर्फ फिल्मों में नजर आईं बल्कि “देल्ही बेली” जैसी फिल्म तो लग रही थी कि पूरी फिल्म ही गालियों पर आधारित हो. देल्ही बेली, मर्डर 2 और कई अन्य फिल्मों में तो गालियों की पूरी बौछार थी. नो वन किल्ड जेसिका जैसी महिला प्रधान फिल्मों में महिलाएं भी गालियां देती दिखीं.


HOT BOLLYWOOD बोल्ड हुआ बॉलिवुड: एक समय था जब बॉलिवुड में बोल्ड के नाम पर अभिनेत्रियां ज्यादा से ज्यादा समुद्र के किनारे बिकनी में नहा लेती थीं या फिर फिल्म में एकाध बेड सीन होते थे. लेकिन अब तो फिल्मों में बोल्ड के सभी मायने ही बदल गए हैं. अब तो फिल्मों में हीरो-हिरोइन के बीच इतने अंतरंग दृश्य दिखाए जाते हैं कि लोगों को ब्लू फिल्म की शरण में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. मर्डर 2, साहब बीवी और गैंगस्टर, नो वन किल्ड जेसिका, रागिनी एमएमएस आदि जैसी फिल्मों ने साल 2011 में बॉलिवुड को सेक्स का तड़का लगाने का नया फॉर्मूला दिया. “ए” सार्टिफिकेट लो और फिल्म को रिलीज कराओ. अब फिल्मकार “ए” सार्टिफिकेट के साथ फिल्मों को पर्दे पर उतारने से बिलकुल नहीं कतराते.


एक्शन का रोमांच लौट आया: यह एक बात ऐसी है जिसने ट्रेड पंडितों के होश उड़ा दिए. जो लोग कहते थे कि अब दर्शक एक्शन से दूर होने लगे हैं उनकी सोच को साल 2011 में बॉडीगार्ड, रेडी और सिंघम जैसी सफल एक्शन फिल्मों ने बदल कर रख दिया.


विलेन का रोल बदला: कभी फिल्मों में विलेन का काम लोगों को डराना होता था पर अब विलेन दर्शकों को हंसाता भी है.


संगीत का असर हुआ है कम: कभी होता था कि फिल्मों में संगीत एक अहम रोल निभाया करते थे. पर अब फिल्में बिना किसी मजबूत संगीत के भी चल जाती हैं. लेकिन साल 2011 में ऐसी फिल्मों का बोलबाला रहा जिसमें बेहतरीन संगीत था.