Saturday, September 29, 2012

श्राद्ध

श्राद्ध: दस सवाल जो आज के युवा पूछना चाहते हैं

1. श्राद्ध क्या है?
श्राद्ध प्रथा वैदिक काल के बाद शुरू हुई। और इसके मूल में उपरोक्त श्लोक की भावना है। उचित समय पर शास्त्रसम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धा भाव से मंत्रों के साथ जो (दान-दक्षिणा आदि) दिया जाए, वही श्राद्ध कहलाता है।

2. श्राद्ध के मुख्य देवता कौन हैं?
वसु, रुद्र तथा आदित्य, ये श्राद्ध के देवता हैं।

3. श्राद्ध किसका किया जाता है? और क्यों?
हर मनुष्य के तीन पूर्वज : पिता, दादा और परदादा क्रमश: वसु, रुद्र और
आदित्य के समान माने जाते हैं। श्राद्ध के वक्त वे ही सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि समङो जाते हैं। समझ जाता है, कि वे श्राद्ध कराने वालों के शरीर में प्रवेश करते हैं। और ठीक ढंग से किए श्राद्ध से तृप्त होकर वे अपने वंशधर के सपरिवार सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य का वरदान देते हैं। श्राद्ध के बाद उस दौरान उच्चरित मंत्रों तथा आहुतियों को वे सभी पितरों तक ले जाते हैं।

4. श्राद्ध कितनी तरह के होते हैं?
नित्य, नैमित्तिक और काम्य। नित्य श्राद्ध, श्राद्ध के दिनों में मृतक के निधन की तिथि पर, नैमित्तिक किसी विशेष पारिवारिक मौके (जैसे पुत्र जन्म) पर और काम्य विशेष मनौती के लिए कृत्तिका या रोहिणी नक्षत्र में किया जाता है।

5. श्राद्ध कौन-कौन कर सकता है?
आमतौर पर पुत्र ही अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते पाए जाते हैं। लेकिन शास्त्रनुसार ऐसा हर व्यक्ति जिसने मृतक की संपत्ति विरासत में पाई है, उसका स्नेहवश श्राद्ध कर सकता है। यहाँ तक कि विद्या की विरासत से लाभान्वित होने वाला छात्र भी अपने दिवंगत गुरु का श्राद्ध कर सकता है। पुत्र की अनुपस्थिति में पौत्र या प्रपौत्र श्राद्ध करते हैं। निस्संतान पत्नी को पति द्वारा, पिता द्वारा पुत्र को और बड़े भाई द्वारा छोटे भाई को पिण्ड नहीं दिया जा सकता। किन्तु कम उम्र का ऐसा बच्च, जिसका उपनयन न हुआ हो, पिता को जल देकर नवश्राद्ध कर सकता है। शेष कार्य (पिण्डदान, अग्निहोम) उसकी ओर से कुल पुरोहित करता है।

6. श्राद्ध के लिए उचित और वजिर्त पदार्थ क्या हैं?
श्राद्ध के लिए उचित द्रव्य हैं : तिल, माष, चावल, जाै, जल, मूल (जड़युक्त सब्जी) और फल। तीन चीजें शुद्धि कारक हैं : पुत्री का पुत्र, तिल और नेपाली कम्बल! श्राद्ध करने में तीन बातें प्रशंसनीय हैं : सफाई, क्रोधहीनता और चैन (त्वरा (शीघ्रता) का न होना)। श्राद्ध में अत्यन्त महत्वपूर्ण बातें हैं : अपरान्ह का समय, कुशा, श्राद्धस्थली की स्वच्छता, उदारता से भोजनादि की व्यवस्था और अच्छे ब्राह्मणों की उपस्थिति।
कुछ अन्न और खाद्य पदार्थ जो श्राद्ध में नहीं लगते, इस प्रकार हैं : मसूर, राजमा, कोदों, चना, कपित्थ, अलसी (तीसी, सन, बासी भोजन और समुद्र जल से बना नमक। भैंस, हरिणी, ऊँटनी, भेड़ और एक खुर वाले पशुओं का दूध भी वजिर्त है। पर भैंस का घी वजिर्त नहीं। श्राद्ध में दूध, दही और घी पितरों के लिए विशेष तुष्टिकारक माने गए हैं।

7. श्राद्ध में कुश तथा तिल का क्या महत्व है?
दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना गया है। माना यह भी जाता है कि कुश और तिल दोनों विष्णु के शरीर से निकले हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, तीनों देवता ब्रह्मा-विष्णु-महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्रभाग में रहते हैं। कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य मनुष्यों का और जड़ पितरों का माना जाता है। तिल पितरों को प्रिय और दुष्टात्माओं को दूर भगाने वाले माने जाते हैं। माना गया है कि बिना तिल बिखेरे श्राद्ध किया जाए, तो दुष्टात्माएँ हवि उठा ले जाती हैं।

8. दरिद्र व्यक्ति श्राद्ध कम खर्चे में कैसे करे?
विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र लोग केवल मोटा अन्न, जंगली साग-पात-फल और न्यूनतम दक्षिणा, वह भी न हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को दे दें। या किसी गाय को दिनभर घास खिला दें। अन्यथा हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करें कि मैंने हाथ वायु में फैला दिए हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।

9. पिण्ड क्या हैं? उनका अर्थ क्या है?
श्राद्ध के दौरान पके हुए चावल दूध और तिल मिश्रित जो पिण्ड बनाते हैं, उसे सपिण्डीकरण कहते हैं। पिण्ड का अर्थ है शरीर। यह एक पारंपरिक विश्वास है, जिसे विज्ञान भी मानता है, कि हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढ़ियों के समन्वित गुणसूत्र मौजूद होते हैं। चावल के पिण्ड जो पिता, दादा और परदादा तथा पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, आपस में मिलाकर फिर अलग बाँटते हैं। यह प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन-जिन लोगों के गुणसूत्र (जीन्स) श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है। इस पिण्ड को गाय-कौओं को देने से पहले पिण्डदान करने वाला सूँघता भी है। अपने यहां सूँघना यानी आधा भोजन करना माना गया है। इस तरह श्राद्ध करने वाला पिण्डदान के पहले अपने पितरों की उपस्थिति को खुद अपने भीतर भी ग्रहण करता है।

10. इस पूरे अनुष्ठान का अर्थ क्या है?
अपने दिवंगत बुजुर्गो को हम दो तरह से याद करते हैं : स्थूल शरीर के रूप में और भावनात्मक रूप से! स्थूल शरीर तो मरने के बाद अग्नि या जलप्रवाह को भेंट कर देते हैं, इसलिए श्राद्ध करते समय हम पितरों की स्मृति उनके ‘भावना शरीर’ की पूजा करते हैं ताकि वे तृप्त हों, और हमें सपरिवार अपना स्नेहपूर्ण आशीर्वाद दें।

Friday, August 10, 2012

श्रीजाहरवीर गोगाजी


भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की नवमी (इस बार 11 अगस्त, शनिवार) गोगा नवमी के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन श्रीजाहरवीर गोगाजी का जन्मोत्सव बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस अवसर पर बाबा जाहरवीर गोगाजी के भक्तगण अपने घरों में इष्टदेव की थाड़ी (थान-वेदी) बनाकर अखण्ड ज्योति जागरण कराते हैं तथा गोगादेवजी की शौर्य गाथा एवं जन्म कथा सुनते हैं। इस प्रथा को जाहरवीर का जोत कथा जागरण कहते हैं। इस दिन कहीं मेले लगते हैं तो कहीं भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। ऐसी मान्यता है कि श्रीगोगादेव भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

कौन थे श्रीगोगादेव महाराज -

श्रीगोगादेव का जन्म नाथ संप्रदाय के योगी गोरक्षनाथ के आशीर्वाद से हुआ था। योगी गोरक्षनाथ ने ही गोगादेवजी की माता बाछल को प्रसाद रूप में अभिमंत्रित गुग्गल दिया था। जिसके प्रभाव से महारानी बाछल से जाहरवीर (श्रीगोगादेव महाराज), पुरोहितानी से नरसिंह पाण्डे, दासी से मज्जूवीर, महतरानी से रत्नावीर तथा बन्ध्या घोड़ी से नीलाŸववीर का जन्म हुआ। इन सभी ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए विधर्मी राजाओं से घोर युद्ध किया जिसमें श्रीगोगादेवजी व नीलाश्व को छोड़कर अन्य वीरगति को प्राप्त हुए। अंत में गुरु गोरक्षनाथ के योग, मंत्र व प्रेरणा से श्रीजाहरवीर गोगाजी ने नीले घोड़े सहित धरती में जीवित समाधि ली।

Thursday, August 9, 2012

‘‘माधुर्य के अकेले अवतार कर्मयोगी श्रीकृष्ण ’’



-
एक प्रसिद्ध कहावत है ‘महापुरुष जन्म से नहीं कर्म से होते हैं’। जन्म लेते समय मनुष्य एक साधारण सा मानव होता है किन्तु धीरे धीरेसंस्कार, शिक्षा, उच्च चारित्र बल एवं पूर्वकृत अच्छे पुण्योद्वय के कारण अपने व्यंिक्तत्व को विकसित ओर प्रभावशाली बनाता हुआ एक दिन मानव से महामानव बन जाता है। वह कंठ धन्य है जिसमें श्री प्रभु का मंगलमय नाम लिया जाता है, वे कान
धन्य है जो श्री प्रभु की महिमा का श्रवण करते हैं।
श्री प्रभु का एक दिव्य स्वरुप हैभगवान् श्रीकृष्ण। जिनके जन्म लेते ही धरती पर आनंद और सुख की लहरें उठी। भय, आतंक से पीड़ित प्रजा में आशा कि एक किरण फूटी कि हमारा ‘तारणहार’ आ गया। वैदिक परम्परा में श्रीकृश्ण भगवान् विष्णु के पूर्व अवतार माने जाते हैं। जैन परम्परा के अनुसार भी त्रेसठ (63) शलाका पुरुषों में एकशलाका पुरुष श्रीकृष्ण ‘वासुदेव’ के नाम से विख्यात है।
धरती पर माधुर्य के अवतार अकेले श्रीकृष्ण ही तो हुए। वे ऐसे पुरुष हुए जिन्होंने अपने जीवन में न कभी जप किया, न तप किया, न जंगलों में जाकर साधना की लेकिन फिर भी वे धरती के भगवान् स्वीकारकिए गए। जन्म से लेकर निर्वाण तक एक भी माला नहीं जपी ओर न ही किसी तरह की साधना की। प्रेम ही उनकी साधना थी और आत्मविष्वास ही उनकी आराधना थी। श्रीकृष्ण की मुरली एवं उनका सुदर्षन चक्र भी मानवता के लिए अमृत वरदान था। चक्र द्वारा मानवता के लिए कलंक बन चुके आतताइयों और आतंकवादियों कासफाया किया ओर समग्र मानवता को प्रेम का सन्देष दिया जिससे सम्पूर्ण मानवता का एक धरातल पर प्रतिष्ठापन हुआ।
श्रीकृश्ण का जीवन ज्ञान एवं कर्म का समन्वित जीवन था। जो उपदेश उन्होंने दूसरों के लिए दिये उसी उपदेश को स्वयं के जीवन में भी चरितार्थ किया। पापियों के संहारक ओर भक्तों के तारक दोनोरुप श्रीकृष्ण के है। श्रीकृष्ण की गीता आत्म विष्वास का शास्त्र है। 18 अध्यायों की गीता उनकी अनुपम देन है। गीता तो धरती का वह अनुपम षिखर है जिससे सारे विश्व को जीवन जीने की कला और समृद्धि की फिजाऐं मिली है।
गीता ही धरती का वह परम शास्त्र है जो मनुष्य को अधिकारों के संरक्षण का विश्वास देता है। आज जिन मानवाधिकारों की रक्षा की बात की जाती है अगर उनकी रक्षा के लिए धरती पर सबसे पहला शंखनाद किसी ने किया तो वह है श्रीमद् भगवद् गीता। कर्मयोग ही गीता का मूल सन्देश है, कर्म आपके कामधेनुकी तरह है, वही व्यक्ति वही देश आगे बढ़ रहे हैं जिन्होंने ऊँचे लक्ष्य के साथ ऊँचा प्रयत्न किया है।
इस धरा पर किसी व्यक्ति ने गऊओं की सेवा के लिए अपने ईष्वरत्व को भी समर्पित किया तो धरती पर वह अकेलाशख्स केवल कर्मयोगी श्रीकृष्ण ही हुए। जिस नारी के प्रति इंसानी नज़रिया हमेशा गलत रहा उसके प्रति अगर आध्यात्मिक प्रेम का, ईष्वरीय प्रेम का संगानअगरकिसी ने किया तो वह भी श्रीकृष्ण ही हुए। श्रीकृष्ण का तो एक एक कण अपने आप में प्रेम ओर माधुर्य से ओत प्रोत है।
आज जन्माष्टमी का पवित्र दिवस है। आज देश में लाखों करोड़ों श्रीकृष्ण के भक्त है जो मन्दिरों में जाकर दर्शन करके अपने आपको धन्य मानते हैं पर क्याकिसी भक्त के दिल में दया नहीं आती कि श्रीकृष्ण की गौमाता जो हैउसकी हालत क्या हो रही है? लाखों गायें प्रतिदिन कत्लखानों में काटी जा रही है। श्रीकृष्ण की जन्म कर्म स्थली इस भारत भूमि पर लाखों करोड़ों छोटे बड़े कत्लखाने है। इस देश में हिंसा कामहाताण्डव श्रीकृश्ण के भक्तों एवं शान्ति के पुजारियों के लिए दिल दहलाने वाला है। अगर इस देष में कृष्ण भक्त एवं इसके अलावा जोभी श्रद्धालु श्रीकृष्ण को दिल में बसाकर यह प्रण ले कि मैं एक गाय का पालन पोषण करुंगा तो इस देष से बहुत जल्दी कत्लखानों मे गायें कटना बंद हो जाएगी।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन दिवस पर मेरा यही कहना है कि आप व्रत रखकर, मन्दिरों में पूजा प्रसाद चढ़ाकर श्रीकृष्ण का जन्मदिवस मनाते हैं तो मनाएँ परन्तु श्रीकृष्ण के आदर्श चरित्र ओर उनके नैतिक उपदेशों के एक एक सूत्र को जीवन में धारण करने के साथ साथ गौमाता रक्षण के लिए आगे आये, गौमाता की सेवा करेंगे तो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाना सार्थक होगा। अंत में इतनी ही.....
संकट में है आज वो धरती, जिस पर तूने जन्म लिया।
पूरा कर दे आज वचन वो, गीता में जो तूने दिया।।

Tuesday, August 7, 2012

कालगणना-१


कालगणना-१ : काल का खगोल से सम्बंध ---------------------------
.
.
इस सृष्टि की उत्पति कब हुई तथा यह सृष्टि कब तक रहेगी यह प्रश्न मानव मन को युगों से मथते रहे हैं। इनका उत्तर पाने के लिए लिए सबसे पहले काल को समझना पड़ेगा। काल जिसके द्वारा हम घटनाओं-परिवर्तनों को नापते हैं, कबसे प्रारंभ हुआ?
इस सृष्टि की उत्पति कब हुई तथा यह सृष्टि कब तक रहेगी यह प्रश्न मानव मन को युगों से मथते रहे हैं।
आधुनिक काल के प्रख्यात ब्रह्माण्ड विज्ञानी स्टीफन हॉकिन्स ने इस पर एक पुस्तक लिखी - brief history of time (समय का संक्षिप्त इतिहास)। उस पुस्तक में वह लिखता है कि समय कब से प्रारंभ हुआ। वह लिखता है कि सृष्टि और समय एक साथ प्रारंभ हुए जब ब्रह्माण्डोत्पति की कारणीभूत घटना आदिद्रव्य में बिग बैंग (महाविस्फोट) हुआ और इस विस्फोट के साथ ही अव्यक्त अवस्था से ब्रह्माण्ड व्यक्त अवस्था में आने लगा। इसी के साथ समय भी उत्पन्न हुआ। अत: सृष्टि और समय एक साथ प्रारंभ हुए और समय कब तक रहेगा, तो जब तक यह सृष्टि रहेगी, तब तक रहेगा, उसके लोप के साथ लोप होगा। दूसरा प्रश्न कि सृष्टि के पूर्व क्या था? इसके उत्तर में हॉकिन्स कहता है कि वह आज अज्ञात है। पर इसे जानने का एक साधन हो सकता है। कोई तारा जब मरता है तो उसका र्इंधन प्रकाश और ऊर्जा के रूप में समाप्त होने लगता है। तब वह सिकुड़ने लगता है। और भारतवर्ष में ऋषियों ने इस पर चिंतन किया, साक्षात्कार किया। ऋग्वेद के नारदीय सूक्त में सृष्टि उत्पत्ति के पूर्व की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा गया कि तब न सत् था न असत् था, न परमाणु था न आकाश, तो उस समय क्या था? तब न मृत्यु थी, न अमरत्व था, न दिन था, न रात थी। उस समय स्पंदन शक्ति युक्त वह एक तत्व था।

सृष्टि पूर्व अंधकार से अंधकार ढंका हुआ था और तप की शक्ति से युक्त एक तत्व था। सर्वप्रथम
हमारे यहां ऋषियों ने काल की परिभाषा करते हुए कहा है "कलयति सर्वाणि भूतानि", जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड को, सृष्टि को खा जाता है। साथ ही कहा कि यह ब्रह्माण्ड एक बार बना और नष्ट हुआ, ऐसा नहीं होता। अपितु उत्पत्ति और लय पुन: उत्पत्ति और लय यह चक्र चलता रहता है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, परिवर्तन और लय के रूप में विराट कालचक्र चल रहा है। काल के इस सर्वग्रासी रूप का वर्णन भारत में और पश्चिम में अनेक कवियों ने किया है। हमारे यहां इसको व्यक्त करते हुए महाकवि क्षेमेन्द्र कहते हैं-

अहो कालसमुद्रस्य न लक्ष्यन्ते तिसंतता:।
मज्जन्तोन्तरनन्तस्य युगान्ता: पर्वता इव।।

अर्थात्-काल के महासमुद्र में कहीं संकोच जैसा अन्तराल नहीं, महाकाय पर्वतों की तरह बड़े-बड़े युग उसमें समाहित हो जाते हैं। पश्चिम में 1990 में नोबल पुरस्कार प्राप्त कवि आक्टोवियो पाज अपनी कविता Into the matter में काल के सर्वभक्षी रूप का वर्णन निम्न प्रकार से करते हैं।

A clock strikes the time
now its time
it is not time now, not it is now
now it is time to get rid of time
now it is not time
it is time and not now
time eats the now
now its time
windows close
walls closed doors close
the words gøo home
Nowwe are more alone..........1

अर्थात्

"काल यंत्र बताता है काल
आ गया आज, काल।
आज में काल नहीं, काल में आज नहीं,
काल को विदा देने का काल है आज।
काल है, आज नहीं,
काल निगलता है आज को।
आज है वह काल
वातायन बंद हो रहे हैं
दीवार है बंद
द्वार बन्द हो रहे हैं
वैखरी पहुंच रही है स्व निकेत
हम तो अब हैं अकेले"

इस काल को नापने का सूक्ष्मतम और महत्तम माप हमारे यहां कहा गया है।

श्रीमद्भागवत में प्रसंग आता है कि जब राजा परीक्षित महामुनि शुकदेव से पूछते हैं, काल क्या है? उसका सूक्ष्मतम और महत्तम रूप क्या है? तब इस प्रश्न का शुकदेव मुनि जो उत्तर देते हैं वह आश्चर्य जनक है, क्योंकि आज के आधुनिक युग में हम जानते हैं कि काल अमूर्त तत्व है। घटने वाली घटनाओं से हम उसे जानते हैं। आज से हजारों वर्ष पूर्व शुकदेव मुनि ने कहा- "विषयों का रूपान्तर" (बदलना) ही काल का आकार है। उसी को निमित्त बना वह काल तत्व अपने को अभिव्यक्त करता है। वह अव्यक्त से व्यक्त होता है।"

काल गणना
इस काल का सूक्ष्मतम अंश परमाणु है तथा महत्तम अंश ब्राहृ आयु है। इसको विस्तार से बताते हुए शुक मुनि उसके विभिन्न माप बताते हैं:-

2 परमाणु- 1 अणु - 15 लघु - 1 नाड़िका
3 अणु - 1 त्रसरेणु - 2 नाड़िका - 1 मुहूत्र्त
3 त्रसरेणु- 1 त्रुटि - 30 मुहूत्र्त - 1 दिन रात
100 त्रुटि- 1 वेध - 7 दिन रात - 1 सप्ताह
3 वेध - 1 लव - 2 सप्ताह - 1 पक्ष
3 लव- 1 निमेष - 2 पक्ष - 1 मास
3 निमेष- 1 क्षण - 2 मास - 1 ऋतु
5 क्षण- 1 काष्ठा - 3 ऋतु - 1 अयन
15 काष्ठा - 1 लघु - 2 अयन - 1 वर्ष

शुक मुनि की गणना से एक दिन रात में 3280500000 परमाणु काल होते हैं तथा एक दिन रात में 86400 सेकेण्ड होते हैं। इसका अर्थ सूक्ष्मतम माप यानी 1 परमाणु काल 1 सेकंड का 37968 वां हिस्सा।

महाभारत के मोक्षपर्व में अ. 231 में कालगणना - निम्न है:-

15 निमेष - 1 काष्ठा
30 काष्ठा -1 कला
30 कला- 1 मुहूत्र्त
30 मुहूत्र्त- 1 दिन रात

दोनों गणनाओं में थोड़ा अन्तर है। शुक मुनि के हिसाब से 1 मुहूर्त में 450 काष्ठा होती है तथा महाभारत की गणना के हिसाब से 1 मुहूर्त में 900 काष्ठा होती हैं। यह गणना की भिन्न पद्धतियों को परिलक्षित करती है।

यह सामान्य गणना के लिए माप है। पर ब्रह्माण्ड की आयु के लिए, ब्रह्माण्ड में होने वाले परिवर्तनों को मापने के लिए बड़ी

कलियुग - 432000 वर्ष
2 कलियुग - द्वापरयुग - 864000 वर्ष
3 कलियुग - त्रेतायुग - 1296000 वर्ष
4 कलियुग - सतयुग - 1728000 वर्ष

चारों युगों की 1 चतुर्युगी - 4320000
71 चतुर्युगी का एक मन्वंतर - 306720000
14 मन्वंतर तथा संध्यांश के 15 सतयुग
का एक कल्प यानी - 4320000000 वर्ष

एक कल्प यानी ब्रह्मा का एक दिन, उतनी ही बड़ी उनकी रात इस प्रकार 100 वर्ष तक एक ब्रह्मा की आयु। और जब एक ब्रह्मा मरता है तो भगवान विष्णु का एक निमेष (आंख की पलक झपकने के काल को निमेष कहते हैं) होता है और विष्णु के बाद रुद्र का काल आरम्भ होता है, जो स्वयं कालरूप है और अनंत है, इसीलिए कहा जाता है कि काल अनन्त है।

शुकदेव महामुनि द्वारा वर्णित इस वर्णन को पढ़कर मन में प्रश्न आ सकता है कि ये सब वर्णन कपोलकल्पना है, बुद्धिविलास है। आज के वैज्ञानिक युग में इन बातों की क्या अहमियत है। परन्तु ये सब वर्ण कपोलकल्पना नहीं अपितु इसका सम्बंध खगोल के साथ है। भारतीय कालगणना खगोल पिण्डों की गति के सूक्ष्म निरीक्षण के आधार पर प्रतिपल, प्रतिदिन होने वाले उसके परिवर्तनों, उसकी गति के आधार पर यानी ठोस वैज्ञानिक सच्चाईयों के आधार पर निर्धारित हुई है। जबकि आज विश्व में प्रचलित ईसवी सन् की कालगणना में केवल एक बात वैज्ञानिक है कि उसका वर्ष पृथ्वी के सूर्य की परिक्रमा करने में लगने वाले समय पर आधारित है। बाकी उसमें माह तथा दिन का दैनंदिन खगोल गति से कोई सम्बंध नहीं है। जबकि भारतीय गणना का प्रतिक्षण, प्रतिदिन, खगोलीय गति से सम्बंध है।

Saturday, August 4, 2012

पंचवटी वाटिका

पीपल, बेल, वट, आंवला व अशोक ये पांचो वृक्ष पंच्वटी कहे गये हैं। इनकी स्थापना पांच दिशाऒं में करनी चाहिए। पीपल पूर्व दिशा में, बेल उत्तर दिशा में, वट (बरगद) पश्चिम दिशा में, आंवला दक्षिण दिशा में तपस्या के लिए स्थापना करनी चाहिए । पांच वर्षों के पश्चात चार हाथ की सुन्दर वेदी की स्थापना बीच मॆं करनी चाहिए । यह अनन्त फलों कॊ देने वाली व तपस्या का फल देने प्रदान करने वाली है।

यदि अधिक जगह उपलब्ध हो तो वृह्द पंचवटी की स्थापना करें । सर्व प्रथम केन्द्र
के चारो ऒर 5 मी० त्रिज्या 10 मी० त्रिज्या, 20 मी० त्रिज्या, 25 मी० त्रिज्या, एवं 30 मी० त्रिज्या, का पांच वृत्त बनाऎ । अन्दर के प्रथम 5 मी० त्रिज्या के वृत पर चारॊ दिशाऒं में चार बेल के वृक्षॊ का स्थापना करॆं। इसके बाद 10 मी० त्रिज्या के द्वीतीय वृत पर चारो कॊनॊं पर चार बरगद का वृक्ष स्थापित करें। 20 मी० त्रिज्या के त्रीतीय वृत की परिधि पर समान दूरी पर ( लगभग 5 मी० ) के अन्तराल पर 25 अशॊक के वृक्ष का रोपण करें। चतुर्थ वृत जिसकी त्रिज्या 25 मी० हॆ के परिधि पर दक्षिण दिशा के लम्ब से 5-5 मी० पर दोनों तरफ दक्षिण दिशा में आंवला के दो वृक्ष चित्रानिसार स्थापित करने का विधान है। आंवला के दो वृक्षॊं की परस्पर दूरी 10 मी० रहेगी । पंचवे अौर अंतिम 30 मी० त्रिज्या के वृत के परधि पर चरो दिशऒं में पीपल के चर वृक्ष का रोपण करें। इस प्रकार कुल उन्तालिस वृक्ष की स्थापना होगी । जिसमें चार वृक्ष बेल, चार बरगद, 25 वृक्ष अशोक, दो वृक्ष आंवला एवं चार वृक्ष पीपल के होंगे।


पंचवटी का महत्व

1 औषधीय महत्व

इन पांच वृक्षों में अद्वितीय औषधीय गुण है । आंवला विटामिन "c" का सबसे सम्रध स्त्रोत ह एवं शरीर को रोग प्रतिरोधी बनाने की महऔषधि है। बरगद का दूध बहुत बलदायी होता है। इसके प्रतिदिन ईस्तेमाल से शरीर का कायाकल्प हो जाता है। पीपल रक्त विकार दूर करने वाला वेदनाशामक एवं शोथहर होता है। बेल पेट सम्बन्धी बीमारियों का अचूक औषधि है तो अशोक स्त्री विकारों को दूर करने वाला औषधीय वृक्ष है।

इस वृक्ष समुह में फलों के पकने का समय इस प्रकार निर्धारित है कि किसी न किसी वृक्ष पर वर्ष भर फल विधमान रहता है। जो मौसमी रोगों के निदान हेतु सरलता से उपलब्ध होता है। गर्मी में जब पाचन सम्बन्धी विकारों की प्रबलता होती है तो बेल है। वर्षाकाल में चर्म रोगों की अधिकता एवं रक्त विकारों में अशॊक परिपक्व होता है। शीत ऋतु में शरीर के ताप एवं उर्जा की आवश्यकता को आंवला पूरा करता है

2 पार्यावरणीय महत्व

बरगद शीतल छाया प्र्दान करने वाला एक विशाल वृक्ष है। गर्मी के दिनों में अपरान्ह में जब सुर्य की प्रचन्ड किरणें असह्य गर्मी प्रदान करत हैं एवं तेज लू चलता है तो पचवटी में पश्चिम के तरफ़ स्थित वट वृक्ष सघन छाया उत्पन्न कर पंचवटी को ठ्न्डा करत है।

पीपल प्रदुषण शोषण करने वाला एवं प्राण वायु उत्पन्न करन वाला सर्वोतम वृक्ष है

अशोक सदाबहार वृक्ष है यह कभी पर्ण रहित नहीं रहता एवं सदॆव छाया प्रदान करत है।

बेल की पत्तियों, काष्ठ एवं फल में तेल ग्रन्थियां होती है जो वातावरण को सुगन्धित रखती हैं।

पछुआ एवं पुरुवा दोनों की तेज हवाऒं से वातावरण में धूल की मात्रा बढती है जिसकॊ पुरब व पश्चिम में स्थित पीपल व बरगद के विशाल पेड अवशोशित कर वातावरण को शुद्ध रखते हैं।

3 धार्मिक महत्व

बेल पर भगवान शंकर का निवास माना गया है तो पीपल पर विष्णु एवं वट वृक्ष पर ब्रह्मा का। इस प्रकार प्रमुख त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश का पंचवटी में निवास है एवं एक ही स्थल पर तीनो के पूजन का लाभ मेलता है।

4 जैव विविधता संरक्षण

पंचवटी में निरन्तर फल उपलब्ध होने से पक्षियों एवं अन्य जीव जन्तुऒं के लिए सदैव भोजन उपलब्ध रहता है एवं वे इस पर स्थाई निवास करते हैं। पीपल व बरगद कोमल काष्टीय वृक्ष है जो पक्षियॊं के घोसला बनाने के उपयुक्त है 

Tuesday, July 31, 2012

अमर शहीद ऊधम सिंह



अमर शहीद ऊधम सिंह (जन्म- 26 दिसंबर, 1899, सुनाम गाँव, पंजाब; मृत्यु- 31 जुलाई, 1940, पेंटनविले जेल) जलियाँवाला बाग़ में निहत्थों को भूनकर अंग्रेज़ भारत की आज़ादी के दीवानों को सबक सिखाना चाहते थे, जिससे वह ब्रिटिश सरकार से टकराने की हिम्मत न कर सकें, किन्तु इस घटना ने स्वतंत्रता की आग को हवा देकर बढ़ा दिया।
जन्म

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए।

    इतिहासकार वीरेंद्र शरण के अनुसार ऊधमसिंह इन सब घटनाओं से बहुत दु:खी तो थे, लेकिन उनकी हिम्मत और संघर्ष करने की ताक़त बहुत बढ़ गई। उन्होंने शिक्षा ज़ारी रखने के साथ ही आज़ादी की लड़ाई में कूदने का भी मन बना लिया। उन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन को ऐसे घाव दिये जिन्हें ब्रिटिश शासक बहुत दिनों तक नहीं भूल पाए।

    इतिहासकार डा. सर्वदानंदन के अनुसार ऊधम सिंह 'सर्व धर्म सम भाव' के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद आज़ाद सिंह रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मो का प्रतीक है।

स्वतंत्रता आंदोलन में भाग

स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सन् 1919 का 13 अप्रैल का दिन आँसुओं में डूबा हुआ है, जब अंग्रेज़ों ने अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में सभा कर रहे निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलायीं और सैकड़ों बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार दिया। मरने वालों में माँओं के सीने से चिपके दुधमुँहे बच्चे, जीवन की संध्या बेला में देश की आज़ादी का सपना देख रहे बूढ़े और देश के लिए सर्वस्व लुटाए को तैयार युवा सभी थे।

इस घटना ने ऊधमसिंह को हिलाकर रख दिया और उन्होंने अंग्रेज़ों से इसका बदला लेने की ठान ली। हिन्दू, मुस्लिम और सिख एकता की नींव रखने वाले 'ऊधम सिंह उर्फ राम मोहम्मद आज़ाद सिंह' ने इस घटना के लिए जनरल माइकल ओ डायर को ज़िम्मेदार माना जो उस समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था। गवर्नर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड, एडवर्ड हैरी डायर, जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग़ को चारों तरफ से घेर कर मशीनगन से गोलियाँ चलवाईं।

विदेश की यात्राएं

इस के बाद घटना ऊधमसिंह ने शपथ ली कि वह माइकल ओ डायर को मारकर इस घटना का बदला लेंगे। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए ऊधमसिंह ने अलग अलग नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्राएँ की। सन् 1934 में ऊधमसिंह लंदन गये और वहाँ 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड़ पर रहने लगे। वहाँ उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार ख़रीदी और अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी ख़रीद ली।

प्रतिशोध

भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए सही समय का इंतज़ार करने लगा। ऊधमसिंह को अपने सैकड़ों भाई बहनों की मौत का बदला लेने का मौक़ा 1940 में मिला। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को 'रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी' की लंदन के 'कॉक्सटन हॉल' में बैठक थी जहाँ माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। ऊधमसिंह उस दिन समय से पहले ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। उन्होंने अपनी रिवाल्वर एक मोटी सी किताब में छिपा ली। उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवाल्वर के आकार में इस तरह से काट लिया, जिसमें डायर की जान लेने वाले हथियार को आसानी से छिपाया जा सके।

आत्मसमर्पण

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए ऊधमसिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियाँ चला दीं। दो गोलियाँ डायर को लगीं, जिससे उसकी तुरन्त मौत हो गई। गोलीबारी में डायर के दो अन्य साथी भी घायल हो गए। ऊधमसिंह ने वहाँ से भागने की कोशिश नहीं की और स्वयं को गिरफ़्तार करा दिया। उन पर मुक़दमा चला। अदालत में जब उनसे सवाल किया गया कि 'वह डायर के साथियों को भी मार सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया।' इस पर ऊधमसिंह ने उत्तर दिया कि, वहाँ पर कई महिलाएँ भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है। अपने बयान में ऊधमसिंह ने कहा- 'मैंने डायर को मारा, क्योंकि वह इसी के लायक़ था। मैंने ब्रिटिश राज्य में अपने देशवासियों की दुर्दशा देखी है। मेरा कर्तव्य था कि मैं देश के लिए कुछ करूं। मुझे मरने का डर नहीं है। देश के लिए कुछ करके जवानी में मरना चाहिए।'
मृत्यु

4 जून 1940 को ऊधमसिंह को डायर की हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें 'पेंटनविले जेल' में फाँसी दे दी गयी। इस प्रकार यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए थे। ऊधमसिंह की अस्थियाँ सम्मान सहित भारत लायी गईं। उनके गाँव में उनकी समाधि बनी हुई है।


Sunday, July 22, 2012

क्या हम उदारीकरण के मिथक रूपी 'कचरा' सोच से बाहर निकल पाएंगे : मानसून और पंचांग

हिन्दू पंचांग के अनुसार श्रावण माह जो भाद्रपद के साथ मिलकर भारत मे मानसून की अवधि का निर्माण करता है, 4 जुलाई को प्रारम्भ हुआ, उसने 5 जुलाई को गर्मी से झुलसे मेरे शहर को बारिश से सराबोर कर दिया। क्या मानसून सही वक़्त पर आया या फिर देरी से, जैसा कि मौसम विभाग विलाप कर रहा था? केंद्रीय कृषि मंत्रालय पसोपेश मे था कि उन किसानों को आश्वस्त कैसे किया जाए जिन्होने खरीफ की फसल की बुआई बहुत जल्दी कर दी थी?

डॉ. के. सी. राजू (जिन्होने भारत के प्रथम सुपर कंप्यूटर परम के निर्माण मे मुख्य भूमिका निभाई तथा जो अल्बर्ट आइन्सटाइन द्वारा की गयी एक गलती को सुधारकर Telesio-Galilei Academy of Science का स्वर्ण पदक प्राप्त कर चुके हैं;) कहते हैं कि मानसून इस वर्ष की भांति ही 2003, 2004, 2006, 2009 और 2010 मे भी ‘देरी’ से आया था। हर बार मानसून ने मौसम विभाग द्वारा जताई गई अकाल की आशंकाओं को गलत सिद्ध किया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जिस ग्रेगोरियन कैलेंडर पर हमारी वैज्ञानिक जमात भरोसा करती है, वह कैलेंडर इस तरह की गणना के लायक ही नहीं है। भारत को पहले यह तय करना होगा कि मानसून किस पांचांग पद्धति के आधार पर चलता है- नक्षत्र आधारित पांचांग के अनुसार या सूर्य की कटिबंधीय स्थिति पर आधारित पंचांग (विषुवतीय पांचांग) के अनुसार? सौर वर्ष का तात्पर्य उस कालावधि से, समय से है जो सूर्य द्वारा मौसम चक्र मे एक स्थान से चलकर पुनः उसी स्थान पर आने मे लिया जाता है अर्थात सूर्य द्वारा एक अक्षांश से दूसरे अक्षांश तक पर उसी स्थान पर पहुँचने के मध्य की कालावधि सौर चक्र कहलती है।


प्रचलित ग्रेगोरियन वर्ष की अवधि विषुवतीय अक्षांशों के मध्य अंतर के सटीक मापन के अभाव मे वास्तविक वर्ष (पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा हेतु लिया जाने वाला समय) के बराबर नहीं है। ग्रेगोरियन वर्ष वास्तविक एक वर्ष से लगभग 20 मिनट छोटा है। यह 20 मिनट की अवधि एक लंबे कालखंड मे धीरे धीरे एकत्रित होकर काल गणना मे बहुत बड़ा अंतर पैदा करती है। भारतीय पांचांग नक्षत्र वर्ष पर आधारित है जो कि काल मापन हेतु अधिक सटीक तथा उपयुक्त है क्योंकि सूर्य निश्चित समय पर ही विभिन्न स्थिर नक्षत्रों (उदाहरण-ध्रुव तारा) से होकर गुज़रता है। यह निरीक्षण तथा मापन हेतु आसान है तथा कृषिगत गतिविधियों का समय तय करने हेतु अत्यंत उपयुक्त है।

ग्रेगोरियन कैलेंडर मे सुधार की आवश्यकता इसलिए महसूस की गयी क्योंकि रोमन लोग अंश गणना मे बहुत कमजोर थे अतः उन्होने जूलियन कैलेंडर मे वर्ष की कालावधि बहुत ही अपरिष्कृत रूप से तय कर दी थी। जूलियन कैलेंडर प्रत्येक 128 दिन बाद 1 दिन पीछे हट जाता था। 1582 ईस्वी तक यह 1250 वर्षों में 10 दिन तक खिसक चुका था क्योंकि काउंसिल ऑफ नीशिया ने कैलेंडर पर ईस्टर का दिन तय करने हेतु वसंत के आगमन का दिन 21 मार्च तय कर दिया था। 16 वी शताब्दी के आते आते वसंत आगमन का दिन 21 की बजाय 11 मार्च को
पड़ने लगा। ग्रेगोरियन सुधार समिति ने इस विसंगति को सुधारने हेतु कैलेंडर को 10 दिन आगे खिसका दिया तथा शताब्दी के प्रत्येकवर्ष की बजाय केवल उसी वर्ष को लीप वर्ष घोषित किया जिसमे 400 का भाग दिया जा सकता था। (उदाहरण-सन 2000)। इस तरह ग्रेगोरियन काल गणना विषुवतीय सौर चक्र की गणना के कुछ निकट आ गयी।

चौंकाने वाली बात यह थी कि स्वतन्त्रता के पश्चात भारतीय पांचाग सुधार समिति ने ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया और कहा कि मौसम विषुवतीय वर्ष पर आधारित होता है! ऊपरी तौर पर विषुवतीय वर्ष कई ज्योतिषीय सिद्धांतों यथा सूर्य सिद्धान्त तथा पंचसिद्धान्तिका द्वारा समर्थित प्रतीत होता है किन्तु वास्तव मे उन्हे गलत पढ़ा और समझा गया है। यहाँ तक की वराहमिहिर तथा पंचसिद्धांतिका  के पूर्व आर्यभट्ट ने भी स्पष्ट रूप से नक्षत्र आधारित पांचाग का समर्थन किया है। मार्क्सवादी इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि भारतीय कृषि नक्षत्रों पर आधारित थी।

आधुनिक भारत ने मानसून का गंभीर अध्ययन नहीं किया है, जबकि आज भी अच्छे मानसून का अर्थ है अच्छा व्यापार और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था। भारतीय वैज्ञानिक स्वर्गीय श्री मेघनाद साहा मानते थे कि मानसून हेतु तापांतर संतुलन ही मायने रखता है;  सी.के. राजू का मत है कि पवनों के चलने की पद्धति इसका निर्धारक तत्व है। किन्तु वे यह भी कहते हैं कि मानसून निर्धारण के सटीक प्रतिमान स्थापित करने हेतु वृहद स्तर पर अध्ययन की ज़रूरत है। हमारे पूर्वजों ने 5000 पांचाग निर्मित किए थे जिनमे से प्रत्येक पांचांग अपनी अक्षांश स्थिति के अनुसार निर्धारित किया गया था।

(अक्षांश अंतर की वजह से ही दिल्ली की अपेक्षा केरल मे मानसून बहुत पहले आ जाता है) यहाँ अत्यंत मजबूत सांस्कृतिक संदर्भ है कि भारतीय पांचांग वर्षा ऋतु के इर्द-गिर्द घूमता है क्योंकि हमारा वर्ष, वर्षा से संबन्धित है। यह सटीक गणना कृषि के लिए सदैव प्रासंगिक है क्योंकि मानसून आगमन निर्धारण मे ज़रा सि चूक कृषि कार्यों व उत्पादन मे कहर बरपा सकती है। नेहरूवादी विचारधारा की ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ के प्रति अंधभक्ति ने मानसून व ऋतु निर्धारण हेतु गुलामों की तरह ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाने पर ज़ोर दिया, यद्यपि सावधानीपूर्ण विश्लेषण यह दर्शाता है कि प्रतिवर्ष मानसून हमारी भारतीय पांचाग पद्धति के अनुसार आता है। फिर भी ‘वैज्ञानिक’ मानसून की ‘देरी’ के विषय मे मिमियाते रहते हैं। इतिहास से सबक लेने हेतु तयार ना होकर उन्होने कृषकों को बर्बाद कर दिया है। हिन्दू पंचांग आधारित कृषि का मूल आधार मानसून है ना कि गर्मी या सर्दी की ऋतुएँ जो यूरोप के लिए प्रासंगिक हो सकती हैं। मानसून पवनों के बहाव पर निर्भर होता है।

पृथ्वी पर पवनों का चलना केवल सूर्य पर आधारित नहीं है। विषुवत रेखा पर गरम हवाएँ ऊपर की ओर उठती हैं किन्तु ध्रुवों की ओर नहीं बढ़ती हैं। पृथ्वी के घूर्णन बल  से उत्पन्न होने वाले बल के फलस्वरूप पवनें अपने रथ को उपोष्ण कटिबन्ध ( उत्तर तथा दक्षिण मे 30 से 35 अक्षांश के मध्य।) अतः मानसून पृथ्वी के घूर्णन बल पर भी निर्भर करता है, जो एक जड़त्वीय बल है। चूंकि संभाव्य जड़त्वीय बल ढांचा नक्षत्रों के प्रति सापेक्ष रूप से निर्धारित है, अतः घूर्णन बल पृथ्वी की नक्षत्र सापेक्षचाल पर आधारित है और इसीलिए मानसून नक्षत्र पंचांग पर निर्भर है। यदि मानसून विषुवतीय पांचांग पर आधारित होता तो विषुवतीय वर्ष तथा नाक्षत्र वर्ष के बीच अंतर की वजह से भारतीय पंचांग गणना गड़बड़ा जाती किन्तु ऐसा आज तक कभी नहीं हुआ। कृषकों को विषुवतीय पांचांग के चक्कर मे नक्षत्र आधारित मौसम पांचांग त्यागने हेतु विवश करने के लिये नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता तथा कथित वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने हमारी खाद्य सुरक्षा को ताक पर रख दिया। एक अजीब संयोग है कि आम जनमानस मे कृषि के प्रति चेतना के लुप्त होने के साथ ही विभिन्न पार्टियों के कृषि आधारित चिह्न (गाय-बछड़ा) हल और किसान (जनता लोक दल) के चुनाव चिह्न गायब हो गए। जबकि कमम्युनिस्ट पार्टी का हंसिया विनाश का प्रतीक बन गया। यह तथ्य हमारी राजनीति मे शहरीकरण के प्रति झुकाव रखती सोच तथा अर्थव्यवस्था के प्रति हमारी तुड़ी-मुड़ी विकृत समझ को दर्शाता है। जिसके बुरे परिणाम हमे ग्रसने लगे हैं।

उदारीकरण व वैश्वीकरण के 2 दशकों के पश्चात तथा उद्योग व सेवा क्षेत्रों मे हजारों करोड़ रुपयों की प्रोत्साहन राशि फूंकने के बावजूद ये क्षेत्र विकास को गति देने मे नाकाम रहे हैं, ऊपर से इन्होने देशभर मे रोजगार की उपलब्धता को बाधित ही किया है। देश की अर्थव्यवस्था अच्छे मानसून के लिए हाँफ रही है ताकि वर्तमान की दलदली परिस्थितियों से उबर सके। क्या कम से कम अब हम उदारीकरण के मिथक रूपी उस कचरा सोच से बाहर निकाल पाएंगे जिसके अनुसार कृषि और विकास मे कोई संबंध नहीं है?