Thursday, August 9, 2012

‘‘माधुर्य के अकेले अवतार कर्मयोगी श्रीकृष्ण ’’



-
एक प्रसिद्ध कहावत है ‘महापुरुष जन्म से नहीं कर्म से होते हैं’। जन्म लेते समय मनुष्य एक साधारण सा मानव होता है किन्तु धीरे धीरेसंस्कार, शिक्षा, उच्च चारित्र बल एवं पूर्वकृत अच्छे पुण्योद्वय के कारण अपने व्यंिक्तत्व को विकसित ओर प्रभावशाली बनाता हुआ एक दिन मानव से महामानव बन जाता है। वह कंठ धन्य है जिसमें श्री प्रभु का मंगलमय नाम लिया जाता है, वे कान
धन्य है जो श्री प्रभु की महिमा का श्रवण करते हैं।
श्री प्रभु का एक दिव्य स्वरुप हैभगवान् श्रीकृष्ण। जिनके जन्म लेते ही धरती पर आनंद और सुख की लहरें उठी। भय, आतंक से पीड़ित प्रजा में आशा कि एक किरण फूटी कि हमारा ‘तारणहार’ आ गया। वैदिक परम्परा में श्रीकृश्ण भगवान् विष्णु के पूर्व अवतार माने जाते हैं। जैन परम्परा के अनुसार भी त्रेसठ (63) शलाका पुरुषों में एकशलाका पुरुष श्रीकृष्ण ‘वासुदेव’ के नाम से विख्यात है।
धरती पर माधुर्य के अवतार अकेले श्रीकृष्ण ही तो हुए। वे ऐसे पुरुष हुए जिन्होंने अपने जीवन में न कभी जप किया, न तप किया, न जंगलों में जाकर साधना की लेकिन फिर भी वे धरती के भगवान् स्वीकारकिए गए। जन्म से लेकर निर्वाण तक एक भी माला नहीं जपी ओर न ही किसी तरह की साधना की। प्रेम ही उनकी साधना थी और आत्मविष्वास ही उनकी आराधना थी। श्रीकृष्ण की मुरली एवं उनका सुदर्षन चक्र भी मानवता के लिए अमृत वरदान था। चक्र द्वारा मानवता के लिए कलंक बन चुके आतताइयों और आतंकवादियों कासफाया किया ओर समग्र मानवता को प्रेम का सन्देष दिया जिससे सम्पूर्ण मानवता का एक धरातल पर प्रतिष्ठापन हुआ।
श्रीकृश्ण का जीवन ज्ञान एवं कर्म का समन्वित जीवन था। जो उपदेश उन्होंने दूसरों के लिए दिये उसी उपदेश को स्वयं के जीवन में भी चरितार्थ किया। पापियों के संहारक ओर भक्तों के तारक दोनोरुप श्रीकृष्ण के है। श्रीकृष्ण की गीता आत्म विष्वास का शास्त्र है। 18 अध्यायों की गीता उनकी अनुपम देन है। गीता तो धरती का वह अनुपम षिखर है जिससे सारे विश्व को जीवन जीने की कला और समृद्धि की फिजाऐं मिली है।
गीता ही धरती का वह परम शास्त्र है जो मनुष्य को अधिकारों के संरक्षण का विश्वास देता है। आज जिन मानवाधिकारों की रक्षा की बात की जाती है अगर उनकी रक्षा के लिए धरती पर सबसे पहला शंखनाद किसी ने किया तो वह है श्रीमद् भगवद् गीता। कर्मयोग ही गीता का मूल सन्देश है, कर्म आपके कामधेनुकी तरह है, वही व्यक्ति वही देश आगे बढ़ रहे हैं जिन्होंने ऊँचे लक्ष्य के साथ ऊँचा प्रयत्न किया है।
इस धरा पर किसी व्यक्ति ने गऊओं की सेवा के लिए अपने ईष्वरत्व को भी समर्पित किया तो धरती पर वह अकेलाशख्स केवल कर्मयोगी श्रीकृष्ण ही हुए। जिस नारी के प्रति इंसानी नज़रिया हमेशा गलत रहा उसके प्रति अगर आध्यात्मिक प्रेम का, ईष्वरीय प्रेम का संगानअगरकिसी ने किया तो वह भी श्रीकृष्ण ही हुए। श्रीकृष्ण का तो एक एक कण अपने आप में प्रेम ओर माधुर्य से ओत प्रोत है।
आज जन्माष्टमी का पवित्र दिवस है। आज देश में लाखों करोड़ों श्रीकृष्ण के भक्त है जो मन्दिरों में जाकर दर्शन करके अपने आपको धन्य मानते हैं पर क्याकिसी भक्त के दिल में दया नहीं आती कि श्रीकृष्ण की गौमाता जो हैउसकी हालत क्या हो रही है? लाखों गायें प्रतिदिन कत्लखानों में काटी जा रही है। श्रीकृष्ण की जन्म कर्म स्थली इस भारत भूमि पर लाखों करोड़ों छोटे बड़े कत्लखाने है। इस देश में हिंसा कामहाताण्डव श्रीकृश्ण के भक्तों एवं शान्ति के पुजारियों के लिए दिल दहलाने वाला है। अगर इस देष में कृष्ण भक्त एवं इसके अलावा जोभी श्रद्धालु श्रीकृष्ण को दिल में बसाकर यह प्रण ले कि मैं एक गाय का पालन पोषण करुंगा तो इस देष से बहुत जल्दी कत्लखानों मे गायें कटना बंद हो जाएगी।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन दिवस पर मेरा यही कहना है कि आप व्रत रखकर, मन्दिरों में पूजा प्रसाद चढ़ाकर श्रीकृष्ण का जन्मदिवस मनाते हैं तो मनाएँ परन्तु श्रीकृष्ण के आदर्श चरित्र ओर उनके नैतिक उपदेशों के एक एक सूत्र को जीवन में धारण करने के साथ साथ गौमाता रक्षण के लिए आगे आये, गौमाता की सेवा करेंगे तो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाना सार्थक होगा। अंत में इतनी ही.....
संकट में है आज वो धरती, जिस पर तूने जन्म लिया।
पूरा कर दे आज वचन वो, गीता में जो तूने दिया।।

Tuesday, August 7, 2012

कालगणना-१


कालगणना-१ : काल का खगोल से सम्बंध ---------------------------
.
.
इस सृष्टि की उत्पति कब हुई तथा यह सृष्टि कब तक रहेगी यह प्रश्न मानव मन को युगों से मथते रहे हैं। इनका उत्तर पाने के लिए लिए सबसे पहले काल को समझना पड़ेगा। काल जिसके द्वारा हम घटनाओं-परिवर्तनों को नापते हैं, कबसे प्रारंभ हुआ?
इस सृष्टि की उत्पति कब हुई तथा यह सृष्टि कब तक रहेगी यह प्रश्न मानव मन को युगों से मथते रहे हैं।
आधुनिक काल के प्रख्यात ब्रह्माण्ड विज्ञानी स्टीफन हॉकिन्स ने इस पर एक पुस्तक लिखी - brief history of time (समय का संक्षिप्त इतिहास)। उस पुस्तक में वह लिखता है कि समय कब से प्रारंभ हुआ। वह लिखता है कि सृष्टि और समय एक साथ प्रारंभ हुए जब ब्रह्माण्डोत्पति की कारणीभूत घटना आदिद्रव्य में बिग बैंग (महाविस्फोट) हुआ और इस विस्फोट के साथ ही अव्यक्त अवस्था से ब्रह्माण्ड व्यक्त अवस्था में आने लगा। इसी के साथ समय भी उत्पन्न हुआ। अत: सृष्टि और समय एक साथ प्रारंभ हुए और समय कब तक रहेगा, तो जब तक यह सृष्टि रहेगी, तब तक रहेगा, उसके लोप के साथ लोप होगा। दूसरा प्रश्न कि सृष्टि के पूर्व क्या था? इसके उत्तर में हॉकिन्स कहता है कि वह आज अज्ञात है। पर इसे जानने का एक साधन हो सकता है। कोई तारा जब मरता है तो उसका र्इंधन प्रकाश और ऊर्जा के रूप में समाप्त होने लगता है। तब वह सिकुड़ने लगता है। और भारतवर्ष में ऋषियों ने इस पर चिंतन किया, साक्षात्कार किया। ऋग्वेद के नारदीय सूक्त में सृष्टि उत्पत्ति के पूर्व की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा गया कि तब न सत् था न असत् था, न परमाणु था न आकाश, तो उस समय क्या था? तब न मृत्यु थी, न अमरत्व था, न दिन था, न रात थी। उस समय स्पंदन शक्ति युक्त वह एक तत्व था।

सृष्टि पूर्व अंधकार से अंधकार ढंका हुआ था और तप की शक्ति से युक्त एक तत्व था। सर्वप्रथम
हमारे यहां ऋषियों ने काल की परिभाषा करते हुए कहा है "कलयति सर्वाणि भूतानि", जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड को, सृष्टि को खा जाता है। साथ ही कहा कि यह ब्रह्माण्ड एक बार बना और नष्ट हुआ, ऐसा नहीं होता। अपितु उत्पत्ति और लय पुन: उत्पत्ति और लय यह चक्र चलता रहता है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, परिवर्तन और लय के रूप में विराट कालचक्र चल रहा है। काल के इस सर्वग्रासी रूप का वर्णन भारत में और पश्चिम में अनेक कवियों ने किया है। हमारे यहां इसको व्यक्त करते हुए महाकवि क्षेमेन्द्र कहते हैं-

अहो कालसमुद्रस्य न लक्ष्यन्ते तिसंतता:।
मज्जन्तोन्तरनन्तस्य युगान्ता: पर्वता इव।।

अर्थात्-काल के महासमुद्र में कहीं संकोच जैसा अन्तराल नहीं, महाकाय पर्वतों की तरह बड़े-बड़े युग उसमें समाहित हो जाते हैं। पश्चिम में 1990 में नोबल पुरस्कार प्राप्त कवि आक्टोवियो पाज अपनी कविता Into the matter में काल के सर्वभक्षी रूप का वर्णन निम्न प्रकार से करते हैं।

A clock strikes the time
now its time
it is not time now, not it is now
now it is time to get rid of time
now it is not time
it is time and not now
time eats the now
now its time
windows close
walls closed doors close
the words gøo home
Nowwe are more alone..........1

अर्थात्

"काल यंत्र बताता है काल
आ गया आज, काल।
आज में काल नहीं, काल में आज नहीं,
काल को विदा देने का काल है आज।
काल है, आज नहीं,
काल निगलता है आज को।
आज है वह काल
वातायन बंद हो रहे हैं
दीवार है बंद
द्वार बन्द हो रहे हैं
वैखरी पहुंच रही है स्व निकेत
हम तो अब हैं अकेले"

इस काल को नापने का सूक्ष्मतम और महत्तम माप हमारे यहां कहा गया है।

श्रीमद्भागवत में प्रसंग आता है कि जब राजा परीक्षित महामुनि शुकदेव से पूछते हैं, काल क्या है? उसका सूक्ष्मतम और महत्तम रूप क्या है? तब इस प्रश्न का शुकदेव मुनि जो उत्तर देते हैं वह आश्चर्य जनक है, क्योंकि आज के आधुनिक युग में हम जानते हैं कि काल अमूर्त तत्व है। घटने वाली घटनाओं से हम उसे जानते हैं। आज से हजारों वर्ष पूर्व शुकदेव मुनि ने कहा- "विषयों का रूपान्तर" (बदलना) ही काल का आकार है। उसी को निमित्त बना वह काल तत्व अपने को अभिव्यक्त करता है। वह अव्यक्त से व्यक्त होता है।"

काल गणना
इस काल का सूक्ष्मतम अंश परमाणु है तथा महत्तम अंश ब्राहृ आयु है। इसको विस्तार से बताते हुए शुक मुनि उसके विभिन्न माप बताते हैं:-

2 परमाणु- 1 अणु - 15 लघु - 1 नाड़िका
3 अणु - 1 त्रसरेणु - 2 नाड़िका - 1 मुहूत्र्त
3 त्रसरेणु- 1 त्रुटि - 30 मुहूत्र्त - 1 दिन रात
100 त्रुटि- 1 वेध - 7 दिन रात - 1 सप्ताह
3 वेध - 1 लव - 2 सप्ताह - 1 पक्ष
3 लव- 1 निमेष - 2 पक्ष - 1 मास
3 निमेष- 1 क्षण - 2 मास - 1 ऋतु
5 क्षण- 1 काष्ठा - 3 ऋतु - 1 अयन
15 काष्ठा - 1 लघु - 2 अयन - 1 वर्ष

शुक मुनि की गणना से एक दिन रात में 3280500000 परमाणु काल होते हैं तथा एक दिन रात में 86400 सेकेण्ड होते हैं। इसका अर्थ सूक्ष्मतम माप यानी 1 परमाणु काल 1 सेकंड का 37968 वां हिस्सा।

महाभारत के मोक्षपर्व में अ. 231 में कालगणना - निम्न है:-

15 निमेष - 1 काष्ठा
30 काष्ठा -1 कला
30 कला- 1 मुहूत्र्त
30 मुहूत्र्त- 1 दिन रात

दोनों गणनाओं में थोड़ा अन्तर है। शुक मुनि के हिसाब से 1 मुहूर्त में 450 काष्ठा होती है तथा महाभारत की गणना के हिसाब से 1 मुहूर्त में 900 काष्ठा होती हैं। यह गणना की भिन्न पद्धतियों को परिलक्षित करती है।

यह सामान्य गणना के लिए माप है। पर ब्रह्माण्ड की आयु के लिए, ब्रह्माण्ड में होने वाले परिवर्तनों को मापने के लिए बड़ी

कलियुग - 432000 वर्ष
2 कलियुग - द्वापरयुग - 864000 वर्ष
3 कलियुग - त्रेतायुग - 1296000 वर्ष
4 कलियुग - सतयुग - 1728000 वर्ष

चारों युगों की 1 चतुर्युगी - 4320000
71 चतुर्युगी का एक मन्वंतर - 306720000
14 मन्वंतर तथा संध्यांश के 15 सतयुग
का एक कल्प यानी - 4320000000 वर्ष

एक कल्प यानी ब्रह्मा का एक दिन, उतनी ही बड़ी उनकी रात इस प्रकार 100 वर्ष तक एक ब्रह्मा की आयु। और जब एक ब्रह्मा मरता है तो भगवान विष्णु का एक निमेष (आंख की पलक झपकने के काल को निमेष कहते हैं) होता है और विष्णु के बाद रुद्र का काल आरम्भ होता है, जो स्वयं कालरूप है और अनंत है, इसीलिए कहा जाता है कि काल अनन्त है।

शुकदेव महामुनि द्वारा वर्णित इस वर्णन को पढ़कर मन में प्रश्न आ सकता है कि ये सब वर्णन कपोलकल्पना है, बुद्धिविलास है। आज के वैज्ञानिक युग में इन बातों की क्या अहमियत है। परन्तु ये सब वर्ण कपोलकल्पना नहीं अपितु इसका सम्बंध खगोल के साथ है। भारतीय कालगणना खगोल पिण्डों की गति के सूक्ष्म निरीक्षण के आधार पर प्रतिपल, प्रतिदिन होने वाले उसके परिवर्तनों, उसकी गति के आधार पर यानी ठोस वैज्ञानिक सच्चाईयों के आधार पर निर्धारित हुई है। जबकि आज विश्व में प्रचलित ईसवी सन् की कालगणना में केवल एक बात वैज्ञानिक है कि उसका वर्ष पृथ्वी के सूर्य की परिक्रमा करने में लगने वाले समय पर आधारित है। बाकी उसमें माह तथा दिन का दैनंदिन खगोल गति से कोई सम्बंध नहीं है। जबकि भारतीय गणना का प्रतिक्षण, प्रतिदिन, खगोलीय गति से सम्बंध है।

Saturday, August 4, 2012

पंचवटी वाटिका

पीपल, बेल, वट, आंवला व अशोक ये पांचो वृक्ष पंच्वटी कहे गये हैं। इनकी स्थापना पांच दिशाऒं में करनी चाहिए। पीपल पूर्व दिशा में, बेल उत्तर दिशा में, वट (बरगद) पश्चिम दिशा में, आंवला दक्षिण दिशा में तपस्या के लिए स्थापना करनी चाहिए । पांच वर्षों के पश्चात चार हाथ की सुन्दर वेदी की स्थापना बीच मॆं करनी चाहिए । यह अनन्त फलों कॊ देने वाली व तपस्या का फल देने प्रदान करने वाली है।

यदि अधिक जगह उपलब्ध हो तो वृह्द पंचवटी की स्थापना करें । सर्व प्रथम केन्द्र
के चारो ऒर 5 मी० त्रिज्या 10 मी० त्रिज्या, 20 मी० त्रिज्या, 25 मी० त्रिज्या, एवं 30 मी० त्रिज्या, का पांच वृत्त बनाऎ । अन्दर के प्रथम 5 मी० त्रिज्या के वृत पर चारॊ दिशाऒं में चार बेल के वृक्षॊ का स्थापना करॆं। इसके बाद 10 मी० त्रिज्या के द्वीतीय वृत पर चारो कॊनॊं पर चार बरगद का वृक्ष स्थापित करें। 20 मी० त्रिज्या के त्रीतीय वृत की परिधि पर समान दूरी पर ( लगभग 5 मी० ) के अन्तराल पर 25 अशॊक के वृक्ष का रोपण करें। चतुर्थ वृत जिसकी त्रिज्या 25 मी० हॆ के परिधि पर दक्षिण दिशा के लम्ब से 5-5 मी० पर दोनों तरफ दक्षिण दिशा में आंवला के दो वृक्ष चित्रानिसार स्थापित करने का विधान है। आंवला के दो वृक्षॊं की परस्पर दूरी 10 मी० रहेगी । पंचवे अौर अंतिम 30 मी० त्रिज्या के वृत के परधि पर चरो दिशऒं में पीपल के चर वृक्ष का रोपण करें। इस प्रकार कुल उन्तालिस वृक्ष की स्थापना होगी । जिसमें चार वृक्ष बेल, चार बरगद, 25 वृक्ष अशोक, दो वृक्ष आंवला एवं चार वृक्ष पीपल के होंगे।


पंचवटी का महत्व

1 औषधीय महत्व

इन पांच वृक्षों में अद्वितीय औषधीय गुण है । आंवला विटामिन "c" का सबसे सम्रध स्त्रोत ह एवं शरीर को रोग प्रतिरोधी बनाने की महऔषधि है। बरगद का दूध बहुत बलदायी होता है। इसके प्रतिदिन ईस्तेमाल से शरीर का कायाकल्प हो जाता है। पीपल रक्त विकार दूर करने वाला वेदनाशामक एवं शोथहर होता है। बेल पेट सम्बन्धी बीमारियों का अचूक औषधि है तो अशोक स्त्री विकारों को दूर करने वाला औषधीय वृक्ष है।

इस वृक्ष समुह में फलों के पकने का समय इस प्रकार निर्धारित है कि किसी न किसी वृक्ष पर वर्ष भर फल विधमान रहता है। जो मौसमी रोगों के निदान हेतु सरलता से उपलब्ध होता है। गर्मी में जब पाचन सम्बन्धी विकारों की प्रबलता होती है तो बेल है। वर्षाकाल में चर्म रोगों की अधिकता एवं रक्त विकारों में अशॊक परिपक्व होता है। शीत ऋतु में शरीर के ताप एवं उर्जा की आवश्यकता को आंवला पूरा करता है

2 पार्यावरणीय महत्व

बरगद शीतल छाया प्र्दान करने वाला एक विशाल वृक्ष है। गर्मी के दिनों में अपरान्ह में जब सुर्य की प्रचन्ड किरणें असह्य गर्मी प्रदान करत हैं एवं तेज लू चलता है तो पचवटी में पश्चिम के तरफ़ स्थित वट वृक्ष सघन छाया उत्पन्न कर पंचवटी को ठ्न्डा करत है।

पीपल प्रदुषण शोषण करने वाला एवं प्राण वायु उत्पन्न करन वाला सर्वोतम वृक्ष है

अशोक सदाबहार वृक्ष है यह कभी पर्ण रहित नहीं रहता एवं सदॆव छाया प्रदान करत है।

बेल की पत्तियों, काष्ठ एवं फल में तेल ग्रन्थियां होती है जो वातावरण को सुगन्धित रखती हैं।

पछुआ एवं पुरुवा दोनों की तेज हवाऒं से वातावरण में धूल की मात्रा बढती है जिसकॊ पुरब व पश्चिम में स्थित पीपल व बरगद के विशाल पेड अवशोशित कर वातावरण को शुद्ध रखते हैं।

3 धार्मिक महत्व

बेल पर भगवान शंकर का निवास माना गया है तो पीपल पर विष्णु एवं वट वृक्ष पर ब्रह्मा का। इस प्रकार प्रमुख त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश का पंचवटी में निवास है एवं एक ही स्थल पर तीनो के पूजन का लाभ मेलता है।

4 जैव विविधता संरक्षण

पंचवटी में निरन्तर फल उपलब्ध होने से पक्षियों एवं अन्य जीव जन्तुऒं के लिए सदैव भोजन उपलब्ध रहता है एवं वे इस पर स्थाई निवास करते हैं। पीपल व बरगद कोमल काष्टीय वृक्ष है जो पक्षियॊं के घोसला बनाने के उपयुक्त है 

Tuesday, July 31, 2012

अमर शहीद ऊधम सिंह



अमर शहीद ऊधम सिंह (जन्म- 26 दिसंबर, 1899, सुनाम गाँव, पंजाब; मृत्यु- 31 जुलाई, 1940, पेंटनविले जेल) जलियाँवाला बाग़ में निहत्थों को भूनकर अंग्रेज़ भारत की आज़ादी के दीवानों को सबक सिखाना चाहते थे, जिससे वह ब्रिटिश सरकार से टकराने की हिम्मत न कर सकें, किन्तु इस घटना ने स्वतंत्रता की आग को हवा देकर बढ़ा दिया।
जन्म

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए।

    इतिहासकार वीरेंद्र शरण के अनुसार ऊधमसिंह इन सब घटनाओं से बहुत दु:खी तो थे, लेकिन उनकी हिम्मत और संघर्ष करने की ताक़त बहुत बढ़ गई। उन्होंने शिक्षा ज़ारी रखने के साथ ही आज़ादी की लड़ाई में कूदने का भी मन बना लिया। उन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन को ऐसे घाव दिये जिन्हें ब्रिटिश शासक बहुत दिनों तक नहीं भूल पाए।

    इतिहासकार डा. सर्वदानंदन के अनुसार ऊधम सिंह 'सर्व धर्म सम भाव' के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद आज़ाद सिंह रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मो का प्रतीक है।

स्वतंत्रता आंदोलन में भाग

स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सन् 1919 का 13 अप्रैल का दिन आँसुओं में डूबा हुआ है, जब अंग्रेज़ों ने अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में सभा कर रहे निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलायीं और सैकड़ों बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार दिया। मरने वालों में माँओं के सीने से चिपके दुधमुँहे बच्चे, जीवन की संध्या बेला में देश की आज़ादी का सपना देख रहे बूढ़े और देश के लिए सर्वस्व लुटाए को तैयार युवा सभी थे।

इस घटना ने ऊधमसिंह को हिलाकर रख दिया और उन्होंने अंग्रेज़ों से इसका बदला लेने की ठान ली। हिन्दू, मुस्लिम और सिख एकता की नींव रखने वाले 'ऊधम सिंह उर्फ राम मोहम्मद आज़ाद सिंह' ने इस घटना के लिए जनरल माइकल ओ डायर को ज़िम्मेदार माना जो उस समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था। गवर्नर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड, एडवर्ड हैरी डायर, जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग़ को चारों तरफ से घेर कर मशीनगन से गोलियाँ चलवाईं।

विदेश की यात्राएं

इस के बाद घटना ऊधमसिंह ने शपथ ली कि वह माइकल ओ डायर को मारकर इस घटना का बदला लेंगे। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए ऊधमसिंह ने अलग अलग नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्राएँ की। सन् 1934 में ऊधमसिंह लंदन गये और वहाँ 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड़ पर रहने लगे। वहाँ उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार ख़रीदी और अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी ख़रीद ली।

प्रतिशोध

भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए सही समय का इंतज़ार करने लगा। ऊधमसिंह को अपने सैकड़ों भाई बहनों की मौत का बदला लेने का मौक़ा 1940 में मिला। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को 'रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी' की लंदन के 'कॉक्सटन हॉल' में बैठक थी जहाँ माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। ऊधमसिंह उस दिन समय से पहले ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। उन्होंने अपनी रिवाल्वर एक मोटी सी किताब में छिपा ली। उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवाल्वर के आकार में इस तरह से काट लिया, जिसमें डायर की जान लेने वाले हथियार को आसानी से छिपाया जा सके।

आत्मसमर्पण

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए ऊधमसिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियाँ चला दीं। दो गोलियाँ डायर को लगीं, जिससे उसकी तुरन्त मौत हो गई। गोलीबारी में डायर के दो अन्य साथी भी घायल हो गए। ऊधमसिंह ने वहाँ से भागने की कोशिश नहीं की और स्वयं को गिरफ़्तार करा दिया। उन पर मुक़दमा चला। अदालत में जब उनसे सवाल किया गया कि 'वह डायर के साथियों को भी मार सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया।' इस पर ऊधमसिंह ने उत्तर दिया कि, वहाँ पर कई महिलाएँ भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है। अपने बयान में ऊधमसिंह ने कहा- 'मैंने डायर को मारा, क्योंकि वह इसी के लायक़ था। मैंने ब्रिटिश राज्य में अपने देशवासियों की दुर्दशा देखी है। मेरा कर्तव्य था कि मैं देश के लिए कुछ करूं। मुझे मरने का डर नहीं है। देश के लिए कुछ करके जवानी में मरना चाहिए।'
मृत्यु

4 जून 1940 को ऊधमसिंह को डायर की हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें 'पेंटनविले जेल' में फाँसी दे दी गयी। इस प्रकार यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए थे। ऊधमसिंह की अस्थियाँ सम्मान सहित भारत लायी गईं। उनके गाँव में उनकी समाधि बनी हुई है।


Sunday, July 22, 2012

क्या हम उदारीकरण के मिथक रूपी 'कचरा' सोच से बाहर निकल पाएंगे : मानसून और पंचांग

हिन्दू पंचांग के अनुसार श्रावण माह जो भाद्रपद के साथ मिलकर भारत मे मानसून की अवधि का निर्माण करता है, 4 जुलाई को प्रारम्भ हुआ, उसने 5 जुलाई को गर्मी से झुलसे मेरे शहर को बारिश से सराबोर कर दिया। क्या मानसून सही वक़्त पर आया या फिर देरी से, जैसा कि मौसम विभाग विलाप कर रहा था? केंद्रीय कृषि मंत्रालय पसोपेश मे था कि उन किसानों को आश्वस्त कैसे किया जाए जिन्होने खरीफ की फसल की बुआई बहुत जल्दी कर दी थी?

डॉ. के. सी. राजू (जिन्होने भारत के प्रथम सुपर कंप्यूटर परम के निर्माण मे मुख्य भूमिका निभाई तथा जो अल्बर्ट आइन्सटाइन द्वारा की गयी एक गलती को सुधारकर Telesio-Galilei Academy of Science का स्वर्ण पदक प्राप्त कर चुके हैं;) कहते हैं कि मानसून इस वर्ष की भांति ही 2003, 2004, 2006, 2009 और 2010 मे भी ‘देरी’ से आया था। हर बार मानसून ने मौसम विभाग द्वारा जताई गई अकाल की आशंकाओं को गलत सिद्ध किया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जिस ग्रेगोरियन कैलेंडर पर हमारी वैज्ञानिक जमात भरोसा करती है, वह कैलेंडर इस तरह की गणना के लायक ही नहीं है। भारत को पहले यह तय करना होगा कि मानसून किस पांचांग पद्धति के आधार पर चलता है- नक्षत्र आधारित पांचांग के अनुसार या सूर्य की कटिबंधीय स्थिति पर आधारित पंचांग (विषुवतीय पांचांग) के अनुसार? सौर वर्ष का तात्पर्य उस कालावधि से, समय से है जो सूर्य द्वारा मौसम चक्र मे एक स्थान से चलकर पुनः उसी स्थान पर आने मे लिया जाता है अर्थात सूर्य द्वारा एक अक्षांश से दूसरे अक्षांश तक पर उसी स्थान पर पहुँचने के मध्य की कालावधि सौर चक्र कहलती है।


प्रचलित ग्रेगोरियन वर्ष की अवधि विषुवतीय अक्षांशों के मध्य अंतर के सटीक मापन के अभाव मे वास्तविक वर्ष (पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा हेतु लिया जाने वाला समय) के बराबर नहीं है। ग्रेगोरियन वर्ष वास्तविक एक वर्ष से लगभग 20 मिनट छोटा है। यह 20 मिनट की अवधि एक लंबे कालखंड मे धीरे धीरे एकत्रित होकर काल गणना मे बहुत बड़ा अंतर पैदा करती है। भारतीय पांचांग नक्षत्र वर्ष पर आधारित है जो कि काल मापन हेतु अधिक सटीक तथा उपयुक्त है क्योंकि सूर्य निश्चित समय पर ही विभिन्न स्थिर नक्षत्रों (उदाहरण-ध्रुव तारा) से होकर गुज़रता है। यह निरीक्षण तथा मापन हेतु आसान है तथा कृषिगत गतिविधियों का समय तय करने हेतु अत्यंत उपयुक्त है।

ग्रेगोरियन कैलेंडर मे सुधार की आवश्यकता इसलिए महसूस की गयी क्योंकि रोमन लोग अंश गणना मे बहुत कमजोर थे अतः उन्होने जूलियन कैलेंडर मे वर्ष की कालावधि बहुत ही अपरिष्कृत रूप से तय कर दी थी। जूलियन कैलेंडर प्रत्येक 128 दिन बाद 1 दिन पीछे हट जाता था। 1582 ईस्वी तक यह 1250 वर्षों में 10 दिन तक खिसक चुका था क्योंकि काउंसिल ऑफ नीशिया ने कैलेंडर पर ईस्टर का दिन तय करने हेतु वसंत के आगमन का दिन 21 मार्च तय कर दिया था। 16 वी शताब्दी के आते आते वसंत आगमन का दिन 21 की बजाय 11 मार्च को
पड़ने लगा। ग्रेगोरियन सुधार समिति ने इस विसंगति को सुधारने हेतु कैलेंडर को 10 दिन आगे खिसका दिया तथा शताब्दी के प्रत्येकवर्ष की बजाय केवल उसी वर्ष को लीप वर्ष घोषित किया जिसमे 400 का भाग दिया जा सकता था। (उदाहरण-सन 2000)। इस तरह ग्रेगोरियन काल गणना विषुवतीय सौर चक्र की गणना के कुछ निकट आ गयी।

चौंकाने वाली बात यह थी कि स्वतन्त्रता के पश्चात भारतीय पांचाग सुधार समिति ने ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया और कहा कि मौसम विषुवतीय वर्ष पर आधारित होता है! ऊपरी तौर पर विषुवतीय वर्ष कई ज्योतिषीय सिद्धांतों यथा सूर्य सिद्धान्त तथा पंचसिद्धान्तिका द्वारा समर्थित प्रतीत होता है किन्तु वास्तव मे उन्हे गलत पढ़ा और समझा गया है। यहाँ तक की वराहमिहिर तथा पंचसिद्धांतिका  के पूर्व आर्यभट्ट ने भी स्पष्ट रूप से नक्षत्र आधारित पांचाग का समर्थन किया है। मार्क्सवादी इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि भारतीय कृषि नक्षत्रों पर आधारित थी।

आधुनिक भारत ने मानसून का गंभीर अध्ययन नहीं किया है, जबकि आज भी अच्छे मानसून का अर्थ है अच्छा व्यापार और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था। भारतीय वैज्ञानिक स्वर्गीय श्री मेघनाद साहा मानते थे कि मानसून हेतु तापांतर संतुलन ही मायने रखता है;  सी.के. राजू का मत है कि पवनों के चलने की पद्धति इसका निर्धारक तत्व है। किन्तु वे यह भी कहते हैं कि मानसून निर्धारण के सटीक प्रतिमान स्थापित करने हेतु वृहद स्तर पर अध्ययन की ज़रूरत है। हमारे पूर्वजों ने 5000 पांचाग निर्मित किए थे जिनमे से प्रत्येक पांचांग अपनी अक्षांश स्थिति के अनुसार निर्धारित किया गया था।

(अक्षांश अंतर की वजह से ही दिल्ली की अपेक्षा केरल मे मानसून बहुत पहले आ जाता है) यहाँ अत्यंत मजबूत सांस्कृतिक संदर्भ है कि भारतीय पांचांग वर्षा ऋतु के इर्द-गिर्द घूमता है क्योंकि हमारा वर्ष, वर्षा से संबन्धित है। यह सटीक गणना कृषि के लिए सदैव प्रासंगिक है क्योंकि मानसून आगमन निर्धारण मे ज़रा सि चूक कृषि कार्यों व उत्पादन मे कहर बरपा सकती है। नेहरूवादी विचारधारा की ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ के प्रति अंधभक्ति ने मानसून व ऋतु निर्धारण हेतु गुलामों की तरह ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाने पर ज़ोर दिया, यद्यपि सावधानीपूर्ण विश्लेषण यह दर्शाता है कि प्रतिवर्ष मानसून हमारी भारतीय पांचाग पद्धति के अनुसार आता है। फिर भी ‘वैज्ञानिक’ मानसून की ‘देरी’ के विषय मे मिमियाते रहते हैं। इतिहास से सबक लेने हेतु तयार ना होकर उन्होने कृषकों को बर्बाद कर दिया है। हिन्दू पंचांग आधारित कृषि का मूल आधार मानसून है ना कि गर्मी या सर्दी की ऋतुएँ जो यूरोप के लिए प्रासंगिक हो सकती हैं। मानसून पवनों के बहाव पर निर्भर होता है।

पृथ्वी पर पवनों का चलना केवल सूर्य पर आधारित नहीं है। विषुवत रेखा पर गरम हवाएँ ऊपर की ओर उठती हैं किन्तु ध्रुवों की ओर नहीं बढ़ती हैं। पृथ्वी के घूर्णन बल  से उत्पन्न होने वाले बल के फलस्वरूप पवनें अपने रथ को उपोष्ण कटिबन्ध ( उत्तर तथा दक्षिण मे 30 से 35 अक्षांश के मध्य।) अतः मानसून पृथ्वी के घूर्णन बल पर भी निर्भर करता है, जो एक जड़त्वीय बल है। चूंकि संभाव्य जड़त्वीय बल ढांचा नक्षत्रों के प्रति सापेक्ष रूप से निर्धारित है, अतः घूर्णन बल पृथ्वी की नक्षत्र सापेक्षचाल पर आधारित है और इसीलिए मानसून नक्षत्र पंचांग पर निर्भर है। यदि मानसून विषुवतीय पांचांग पर आधारित होता तो विषुवतीय वर्ष तथा नाक्षत्र वर्ष के बीच अंतर की वजह से भारतीय पंचांग गणना गड़बड़ा जाती किन्तु ऐसा आज तक कभी नहीं हुआ। कृषकों को विषुवतीय पांचांग के चक्कर मे नक्षत्र आधारित मौसम पांचांग त्यागने हेतु विवश करने के लिये नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता तथा कथित वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने हमारी खाद्य सुरक्षा को ताक पर रख दिया। एक अजीब संयोग है कि आम जनमानस मे कृषि के प्रति चेतना के लुप्त होने के साथ ही विभिन्न पार्टियों के कृषि आधारित चिह्न (गाय-बछड़ा) हल और किसान (जनता लोक दल) के चुनाव चिह्न गायब हो गए। जबकि कमम्युनिस्ट पार्टी का हंसिया विनाश का प्रतीक बन गया। यह तथ्य हमारी राजनीति मे शहरीकरण के प्रति झुकाव रखती सोच तथा अर्थव्यवस्था के प्रति हमारी तुड़ी-मुड़ी विकृत समझ को दर्शाता है। जिसके बुरे परिणाम हमे ग्रसने लगे हैं।

उदारीकरण व वैश्वीकरण के 2 दशकों के पश्चात तथा उद्योग व सेवा क्षेत्रों मे हजारों करोड़ रुपयों की प्रोत्साहन राशि फूंकने के बावजूद ये क्षेत्र विकास को गति देने मे नाकाम रहे हैं, ऊपर से इन्होने देशभर मे रोजगार की उपलब्धता को बाधित ही किया है। देश की अर्थव्यवस्था अच्छे मानसून के लिए हाँफ रही है ताकि वर्तमान की दलदली परिस्थितियों से उबर सके। क्या कम से कम अब हम उदारीकरण के मिथक रूपी उस कचरा सोच से बाहर निकाल पाएंगे जिसके अनुसार कृषि और विकास मे कोई संबंध नहीं है?

Wednesday, July 18, 2012

सभी राजाओं का विवरण

महाभारत के बाद से आधुनिक काल तक के सभी राजाओं का विवरण क्रमवार तरीके से नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है...!

आपको यह जानकर एक बहुत ही आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी होगी कि महाभारत युद्ध के पश्चात् राजा युधिष्ठिर की 30 पीढ़ियों ने 1770 वर्ष 11 माह 10 दिन तक राज्य किया था..... जिसका पूरा विवरण इस प्रकार है :
... क्र................... शासक का नाम.......... वर्ष....माह.. दिन

1. राजा युधिष्ठिर (Raja Yudhisthir)..... 36.... 08.... 25
2 राजा परीक्षित (Raja Parikshit)........ 60.... 00..... 00
3 राजा जनमेजय (Raja Janmejay).... 84.... 07...... 23
4 अश्वमेध (Ashwamedh )................. 82.....08..... 22
5 द्वैतीयरम (Dwateeyram )............... 88.... 02......08
6 क्षत्रमाल (Kshatramal)................... 81.... 11..... 27
7 चित्ररथ (Chitrarath)...................... 75......03.....18
8 दुष्टशैल्य (Dushtashailya)............... 75.....10.......24
9 राजा उग्रसेन (Raja Ugrasain)......... 78.....07.......21
10 राजा शूरसेन (Raja Shoorsain).......78....07........21
11 भुवनपति (Bhuwanpati)................69....05.......05
12 रणजीत (Ranjeet).........................65....10......04
13 श्रक्षक (Shrakshak).......................64.....07......04
14 सुखदेव (Sukhdev)........................62....00.......24
15 नरहरिदेव (Narharidev).................51.....10.......02
16 शुचिरथ (Suchirath).....................42......11.......02
17 शूरसेन द्वितीय (Shoorsain II)........58.....10.......08
18 पर्वतसेन (Parvatsain )..................55.....08.......10
19 मेधावी (Medhawi)........................52.....10......10
20 सोनचीर (Soncheer).....................50.....08.......21
21 भीमदेव (Bheemdev)....................47......09.......20
22 नरहिरदेव द्वितीय (Nraharidev II)...45.....11.......23
23 पूरनमाल (Pooranmal)..................44.....08.......07
24 कर्दवी (Kardavi)...........................44.....10........08
25 अलामामिक (Alamamik)...............50....11........08
26 उदयपाल (Udaipal).......................38....09........00
27 दुवानमल (Duwanmal)..................40....10.......26
28 दामात (Damaat)..........................32....00.......00
29 भीमपाल (Bheempal)...................58....05........08
30 क्षेमक (Kshemak)........................48....11........21



इसके बाद ....क्षेमक के प्रधानमन्त्री विश्व ने क्षेमक का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 14 पीढ़ियों ने 500 वर्ष 3 माह 17 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 विश्व (Vishwa)......................... 17 3 29
2 पुरसेनी (Purseni)..................... 42 8 21
3 वीरसेनी (Veerseni).................. 52 10 07
4 अंगशायी (Anangshayi)........... 47 08 23
5 हरिजित (Harijit).................... 35 09 17
6 परमसेनी (Paramseni)............. 44 02 23
7 सुखपाताल (Sukhpatal)......... 30 02 21
8 काद्रुत (Kadrut)................... 42 09 24
9 सज्ज (Sajj)........................ 32 02 14
10 आम्रचूड़ (Amarchud)......... 27 03 16
11 अमिपाल (Amipal) .............22 11 25
12 दशरथ (Dashrath)............... 25 04 12
13 वीरसाल (Veersaal)...............31 08 11
14 वीरसालसेन (Veersaalsen).......47 0 14

इसके उपरांत...राजा वीरसालसेन के प्रधानमन्त्री वीरमाह ने वीरसालसेन का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 445 वर्ष 5 माह 3 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 राजा वीरमाह (Raja Veermaha)......... 35 10 8
2 अजितसिंह (Ajitsingh)...................... 27 7 19
3 सर्वदत्त (Sarvadatta)..........................28 3 10
4 भुवनपति (Bhuwanpati)...................15 4 10
5 वीरसेन (Veersen)............................21 2 13
6 महिपाल (Mahipal)............................40 8 7
7 शत्रुशाल (Shatrushaal).....................26 4 3
8 संघराज (Sanghraj)........................17 2 10
9 तेजपाल (Tejpal).........................28 11 10
10 मानिकचंद (Manikchand)............37 7 21
11 कामसेनी (Kamseni)..................42 5 10
12 शत्रुमर्दन (Shatrumardan)..........8 11 13
13 जीवनलोक (Jeevanlok).............28 9 17
14 हरिराव (Harirao)......................26 10 29
15 वीरसेन द्वितीय (Veersen II)........35 2 20
16 आदित्यकेतु (Adityaketu)..........23 11 13

ततपश्चात् प्रयाग के राजा धनधर ने आदित्यकेतु का वध करके उसके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 9 पीढ़ी ने 374 वर्ष 11 माह 26 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण इस प्रकार है ..

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 राजा धनधर (Raja Dhandhar)...........23 11 13
2 महर्षि (Maharshi)...............................41 2 29
3 संरछि (Sanrachhi)............................50 10 19
4 महायुध (Mahayudha).........................30 3 8
5 दुर्नाथ (Durnath)...............................28 5 25
6 जीवनराज (Jeevanraj).......................45 2 5
7 रुद्रसेन (Rudrasen)..........................47 4 28
8 आरिलक (Aarilak)..........................52 10 8
9 राजपाल (Rajpal)..............................36 0 0

उसके बाद ...सामन्त महानपाल ने राजपाल का वध करके 14 वर्ष तक राज्य किया। अवन्तिका (वर्तमान उज्जैन) के विक्रमादित्य ने महानपाल का वध करके 93 वर्ष तक राज्य किया। विक्रमादित्य का वध समुद्रपाल ने किया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 372 वर्ष 4 माह 27 दिन तक राज्य किया !
जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 समुद्रपाल (Samudrapal).............54 2 20
2 चन्द्रपाल (Chandrapal)................36 5 4
3 सहपाल (Sahaypal)...................11 4 11
4 देवपाल (Devpal).....................27 1 28
5 नरसिंहपाल (Narsighpal).........18 0 20
6 सामपाल (Sampal)...............27 1 17
7 रघुपाल (Raghupal)...........22 3 25
8 गोविन्दपाल (Govindpal)........27 1 17
9 अमृतपाल (Amratpal).........36 10 13
10 बालिपाल (Balipal).........12 5 27
11 महिपाल (Mahipal)...........13 8 4
12 हरिपाल (Haripal)..........14 8 4
13 सीसपाल (Seespal).......11 10 13
14 मदनपाल (Madanpal)......17 10 19
15 कर्मपाल (Karmpal)........16 2 2
16 विक्रमपाल (Vikrampal).....24 11 13

टिप : कुछ ग्रंथों में सीसपाल के स्थान पर भीमपाल का उल्लेख मिलता है, सम्भव है कि उसके दो नाम रहे हों।

इसके उपरांत .....विक्रमपाल ने पश्चिम में स्थित राजा मालकचन्द बोहरा के राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसमे मालकचन्द बोहरा की विजय हुई और विक्रमपाल मारा गया। मालकचन्द बोहरा की 10 पीढ़ियों ने 191 वर्ष 1 माह 16 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 मालकचन्द (Malukhchand) 54 2 10
2 विक्रमचन्द (Vikramchand) 12 7 12
3 मानकचन्द (Manakchand) 10 0 5
4 रामचन्द (Ramchand) 13 11 8
5 हरिचंद (Harichand) 14 9 24
6 कल्याणचन्द (Kalyanchand) 10 5 4
7 भीमचन्द (Bhimchand) 16 2 9
8 लोवचन्द (Lovchand) 26 3 22
9 गोविन्दचन्द (Govindchand) 31 7 12
10 रानी पद्मावती (Rani Padmavati) 1 0 0

रानी पद्मावती गोविन्दचन्द की पत्नी थीं। कोई सन्तान न होने के कारण पद्मावती ने हरिप्रेम वैरागी को सिंहासनारूढ़ किया जिसकी पीढ़ियों ने 50 वर्ष 0 माह 12 दिन तक राज्य किया !
जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 हरिप्रेम (Hariprem) 7 5 16
2 गोविन्दप्रेम (Govindprem) 20 2 8
3 गोपालप्रेम (Gopalprem) 15 7 28
4 महाबाहु (Mahabahu) 6 8 29

इसके बाद.......राजा महाबाहु ने सन्यास ले लिया । इस पर बंगाल के अधिसेन ने उसके राज्य पर आक्रमण कर अधिकार जमा लिया। अधिसेन की 12 पीढ़ियों ने 152 वर्ष 11 माह 2 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 अधिसेन (Adhisen) 18 5 21
2 विल्वसेन (Vilavalsen) 12 4 2
3 केशवसेन (Keshavsen) 15 7 12
4 माधवसेन (Madhavsen) 12 4 2
5 मयूरसेन (Mayursen) 20 11 27
6 भीमसेन (Bhimsen) 5 10 9
7 कल्याणसेन (Kalyansen) 4 8 21
8 हरिसेन (Harisen) 12 0 25
9 क्षेमसेन (Kshemsen) 8 11 15
10 नारायणसेन (Narayansen) 2 2 29
11 लक्ष्मीसेन (Lakshmisen) 26 10 0
12 दामोदरसेन (Damodarsen) 11 5 19

लेकिन जब ....दामोदरसेन ने उमराव दीपसिंह को प्रताड़ित किया तो दीपसिंह ने सेना की सहायता से दामोदरसेन का वध करके राज्य पर अधिकार कर लिया तथा उसकी 6 पीढ़ियों ने 107 वर्ष 6 माह 22 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 दीपसिंह (Deepsingh) 17 1 26
2 राजसिंह (Rajsingh) 14 5 0
3 रणसिंह (Ransingh) 9 8 11
4 नरसिंह (Narsingh) 45 0 15
5 हरिसिंह (Harisingh) 13 2 29
6 जीवनसिंह (Jeevansingh) 8 0 1

पृथ्वीराज चौहान ने जीवनसिंह पर आक्रमण करके तथा उसका वध करके राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पृथ्वीराज चौहान की 5 पीढ़ियों ने 86 वर्ष 0 माह 20 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।
क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 पृथ्वीराज (Prathviraj) 12 2 19
2 अभयपाल (Abhayapal) 14 5 17
3 दुर्जनपाल (Durjanpal) 11 4 14
4 उदयपाल (Udayapal) 11 7 3
5 यशपाल (Yashpal) 36 4 27

विक्रम संवत 1249 (1193 AD) में मोहम्मद गोरी ने यशपाल पर आक्रमण कर उसे प्रयाग के कारागार में डाल दिया और उसके राज्य को अधिकार में ले लिया।

इस जानकारी का स्रोत स्वामी दयानन्द सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश ग्रंथ, चित्तौड़गढ़ राजस्थान से प्रकाशित पत्रिका हरिशचन्द्रिका और मोहनचन्द्रिका के विक्रम संवत1939 के अंक और कुछ अन्य संस्कृत ग्रंथ है।

Monday, July 16, 2012

अभिवादन शीलस्य नित्यं वृधोपसेविन |

अभिवादन शीलस्य नित्यं वृधोपसेविन |

चत्वारि तस्य वर्धन्तॆ आयुर्विद्या यशॊ बलम् ||



अर्थात :- अपने माता पिता , गुरुजन , को नित्य नमस्कार करने वाले , सेवा करने वाले व्यक्तियों के चार गुण सदैव बढ़ते रहते है |

१-आयु

२-यश

३-विद्या

४-बल



अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पुज्यानांच विमानना |

त्रीणि तत्र प्रवर्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् ||



जहाँ अयोग्य का सम्मान हो , योग्य का तिरस्कार हो वहां तीन घटनाये अवश्य घटित होती है |

१-अकाल

२-आकस्मिक मृत्यु

३-भय का वातावरण

और आज भारत में यह यही हालात है जो किसी से छुपा भी नहीं है ||




आज सामर्थवान हिन्दू को आवश्यकता है की समय समय पर उसे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते रहना चाहिए | कंही ऐसा ना हो सामर्थवान हिन्दू अपने सामर्थ के गरूर में अपनी शक्ति का प्रयोग करना भूल जाए ||



बिलकुल वैसे ही जैसे भारत के अधिकतर हिन्दुओं ने अपने सामर्थ के गरूर में अपनी शक्ति का प्रयोग करना भुला दिया था और अहिंसा के नाम पर कायर और सेकुलारिजम के नाम पर नपुंसक बन बैठा ||



जब जागो तब सुबह होती है और जब आँखे बंद करो तब अन्धकार ,,

निश्चय करने वालों की ही जीत होती है ||



चाणक्य ने कहा है की जो व्यक्ति निडरता , निश्चय , निति और शौर्य से युद्ध करता है उसकी जीत अवश्य होती है |



गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी कहा है :-

देह शिवा वर मोहे, शुभ करमन से कबहूँ ना तरूं;

कबहूँ ना डरूं, जब जाये लडूं , निश्चय कर अपनी जीत करूं



हमारे पडोसी दुश्मन मुल्क पाकिस्तान सहित जितने भी इस्लामिक मुल्क है अधिकतर के पास ४ प्रकार की सेनाये है , जितने भी पश्चिमी देश है उनके पास भी चार प्रकार की सेनाये है लेकिन हमारे पास केवल तीन (३) सेनाये है ||

इस्लामिक और इसाई प्रभुत्तव वाले देशो की चार सेनाये है :-

१-थल सेना

२-नभ सेना

३-जल सेना

४-चर्च यानी इसाइयत और शरियत और इस्लामिक जिहादी |



और इसके विपरीत भारत केवल ३ सेनाओं पर निर्भर है :- जल ,थल ,नभ ||

हार कहाँ पर और कैसे रहे है हम ??

अपने धर्म से विमुख हो कर और अपने धर्म के प्रति असवेदंशील होने पर ||



शूरा सो पह्चनिए, जो लडे दीन के हेत |

पुर्जा पुर्जा कट मरे, कबहूँ ना छाडे खेत ||



अगर इसी तरह हम नपुंसकों और कायरों की भाँती अपना , अपने धर्म का , अपनी सभ्यता , अपनी संस्कृति , अपनी माँ भारती , और माँ भारती के शूरवीर सपूतों का पतन होते खुली आँखों से देखते रहेगे तो एक दिन हमारा अंत निश्चित हो जाएगा ||



उठो , जागो प्रतिकार करो चुप मत रहो क्योकि तुम्हारा चुप रहना माँ भारती और हिंदुत्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है , इस्लामिक और इसाइयत प्रहार से भी बड़ा खतरा तुम्हारा चुप रहना है ||



इंडियन सेकुलर नहीं सनातनी भारतीय बनो , धर्म बचेगा तो राष्ट्र बचेगा नहीं तो भारत में कंही मुग्लिस्तान तो कंही दूसरा पाकिस्तान बनेगा ||



यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||



इस मन्त्र को आत्मसात करो और भगवान् श्री कृष्ण से प्रेरणा लेकर अर्जुन बनो और हर धर्म युद्ध में विजयी होने के लिए अधर्मी , लोभी और सत्ता के दलालों का सर्वनाश करो उनको सही मार्ग पर लाओ भले ही वो तुम्हारे अपने सेकुलर हिन्दू हो या विधर्मी पाकिस्तान परस्त मुस्लिम ||



उठो जवान देश की वसुंधरा पुकारती

देश है पुकारता पुकारती माँ भारती

रगों में तेरे बह रहा है खून राम श्याम का

जगदगुरु गोविंद और राजपूती शान का

तू चल पड़ा तो चल पड़ेगी साथ तेरे भारती

देश है पुकारता पुकारती माँ भारती ||

उठा खडग बढा कदम कदम कदम बढाए जा

कदम कदम पे दुश्मनो के धड़ से सर उड़ाए जा

उठेगा विश्व हांथ जोड़ करने तेरी आरती

देश है पुकारता पुकारती माँ भारती ||

तोड़कर ध्ररा को फोड़ आसमाँ की कालिमा

जगा दे सुप्रभात को फैला दे अपनी लालिमा

तेरी शुभ कीर्ति विश्व संकटों को तारती

देश है पुकारता पुकारती माँ भारती ||

है शत्रु दनदना रहा चहूँ दिशा में देश की

पता बता रही हमें किरण किरण दिनेश की

ओ चक्रवती विश्वविजयी मात्र-भू निहारती

देश है पुकारता पुकरती माँ भारती ||





सार्थक और सकरात्मक सोचो किन्तु नकरात्मक दृष्टि को ताक पर रखकर नहीं क्योकि नकरात्मक दृष्टि ही सकरात्मक सोच को जन्म देती है || जो होने वाला है उसे रोकने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी | अन्यथा आगे जाकर देर हो चुकी होगी और पुनः भारत माँ के आँचल के टुकड़े होकर विधर्मियों के पैरों टेल रोंधे जायेगे ||



आगे आओ हे हिन्दू वीरों तुम शूरवीर हो ,, तुम भगवान् श्री राम कृष्ण के वंशज हो , तुम मंगल पांडे , आज़ाद , भगत सिंह ,राजगुरु , सुखदेव के वंसज हो | अपने ऊपर से जयचंद , मानसिंह ,गाँधी , नेहरू और शोभा सिंह जैसे कुकर्मी , अधर्मी और राष्ट्रद्रोही पूर्वजों का कलंक धो डालो ||



उठो आगे बढ़ो ,, माँ भारती तुम्हे पुकार रही है , तुम्हे निहार रही है , तुम्हे ललकार रही है उसकी रक्षा हेतु अपने धर्म का पालन करो , सनातनी बन कर भारत को अखंड भारत में बदल हुतात्मा नाथूराम गोडसे जी की पावन अस्थियों को सिन्धु के जल में प्रवाहित कर सम्पूर्ण ब्रह्मांड को गौर्वान्तित करा दो , बता दो भारत विश्व गुरु था , है और सदैव रहेगा ||