Sunday, May 13, 2012

Mother's Day



मां को खुशियाँ और सम्मान देने के लिए पूरी ज़िंदगी भी कम होती है। फिर भी विश्व में मां के सम्मान में मातृ दिवस (Mother's Day) मनाया जाता है। मातृ दिवस विश्व के अलग - अलग भागों में अलग - अलग तरीकों से मनाया जाता है। परन्तु मई माह के दूसरेरविवार को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है। हालांकि भारत के कुछ भागों में इसे 19 अगस्त को भी मनाया जाता है, परन्तु अधिक महत्ता अमरीकी आधार पर मनाए जाने वाले मातृ दिवस की है, अमेरिका में यह दिन इतना महत्त्वपूर्ण है कि यह एकदम से उत्सव की तरह मनाया जाता है।[1]

इतिहास

मातृदिवस का इतिहास सदियों पुराना एवं प्राचीन है। यूनान में बंसत ऋतु के आगमन पर रिहा परमेश्वर की मां को सम्मानित करने के लिए यह दिवस मनाया जाता था। 16वीं सदी में इंग्लैण्ड का ईसाई समुदाय ईशु की मां मदर मेरी को सम्मानित करने के लिए यह त्योहार मनाने लगा। `मदर्स डे' मनाने का मूल कारण समस्त माओं को सम्मान देना और एक शिशु के उत्थान में उसकी महान भूमिका को सलाम करना है। इस को आधिकारिक बनाने का निर्णय पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति वूडरो विलसन ने 8 मई1914 को लिया। 8 मई, 1914 में अन्ना की कठिन मेहनत के बाद तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाने और मां के सम्मान में एक दिन के अवकाश की सार्वजनिक घोषणा की। वे समझ रहे थे कि सम्मान, श्रद्धा के साथ माताओं का सशक्तीकरण होना चाहिए, जिससे मातृत्व शक्ति के प्रभाव से युद्धों की विभीषिका रुके। तब से हर वर्ष मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है।[1]
  • मदर्स डे की शुरुआत अमेरिका से हुई। वहाँ एक कवयित्री और लेखिका जूलिया वार्ड होव ने 1870 में 10 मई को माँ के नाम समर्पित करते हुए कई रचनाएँ लिखीं। वे मानती थीं कि महिलाओं की सामाजिक ज़िम्मेदारी व्यापक होनी चाहिए। अमेरिका में मातृ दिवस (मदर्स डे) पर राष्ट्रीय अवकाश होता है। अलग-अलग देशों में मदर्स डे अलग अलग तारीख पर मनाया जाता है। भारत में भी मदर्स डे का महत्व बढ़ रहा है।[2]

माँ से जुड़ी कुछ बातें

  • पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
  • जब मैं पैदा हुआ, इस दुनिया में आया, वो एकमात्र ऐसा दिन था मेरे जीवन का जब मैं रो रहा था और मेरी मॉं के चेहरे पर एक सन्तोषजनक मुस्कान थी। ये शब्द हैं प्रख्यात वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के। एक माँ हमारी भावनाओं के साथ कितनी खूबी से जुड़ी होती है, ये समझाने के लिए उपरोक्त पंक्तियां अपने आप में सम्पूर्ण हैं।[1]
  • किसी औलाद के लिए 'माँ' शब्द का मतलब सिर्फ पुकारने या फिर संबोधित करने से ही नहीं होता बल्कि उसके लिए मां शब्द में ही सारी दुनिया बसती है, दूसरी ओर संतान की खुशी और उसका सुख ही माँ के लि‍ए उसका संसार होता है। क्या कभी आपने सोचा है कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में मां ही क्यों याद आती है क्योंकि वो मां ही होती है जो हमे तब से जानती है जब हम अजन्में होते हैं। बचपन में हमारा रातों का जागना.. जिस वजह से कई रातों तक मां सो भी नहीं पाती थी। जितना मां ने हमारे लिए किया है उतना कोई दूसरा कर ही नहीं सकता। ज़ाहिर है मां के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि एक सदी भी कम है।[3]
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति[4]
अर्थात : पृथ्वी पर जितने भी पुत्रों की मां हैं, वह अत्यंत सरल रूप में हैं। कहने का मतलब कि मां एकदम से सहज रूप में होती हैं। वे अपने पुत्रों पर शीघ्रता से प्रसन्न हो जाती हैं। वह अपनी समस्त खुशियां पुत्रों के लिए त्याग देती हैं, क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कुमाता नहीं हो सकती।[5]
  • निदा फ़ाज़ली के दोहे
इक पलड़े में प्यार रख, दूजे में संसार,
तोले से ही जानिए, किसमें कितना प्यार[5]
  • सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता

सुभद्रा कुमारी चौहान
...बेटा! कहीं चोट तो नहीं लगी
देश के सुदूर पश्चिम में स्थित अर्बुदांचल की एक जीवंत संस्कृति है, जहां विपुल मात्रा में कथा, बोध कथाएं, कहानियां, गीत, संगीत लोक में प्रचलित है। मां की ममता पर यहां लोक में एक कहानी प्रचलित है, जो अविरल प्रस्तुत किया जाता रहा है। कहते हैं एक बार एक युवक को एक लड़की पर दिल आ गया। प्रेम में वह ऐसा खोया कि वह सबकुछ भुला बैठा। लड़के के शादी का प्रस्ताव रखने पर लड़की ने जवाब दिया कि वह उससे विवाह करने को तैयार तो है, लेकिन वह अपनी सास के रूप में किसी को देखना नहीं चाहती। अत: वह अपनी मां का कत्ल कर उसका कलेजा निकाल लाए, तो वह उससे शादी करेगी। युवक पहले काफ़ी दुविधा में रहा, लेकिन फिर अपनी माशूका के लिए मां का कत्ल कर उसका कलेजा निकाल तेजी से प्रेमिका की ओर बढ़ा। तेजी में जाने की हड़बड़ी में उसे ठोकर लगी और वह गिर पड़ा। इस पर मां का कलेजा गिर पड़ा और कलेजे से आवाज़ आई, बेटा, कहीं चोट तो नहीं लगी...आ बेटा, पट्टी बांध दूं...।[5]
  • दीवार फ़िल्म
"मेरे पास बंगला है, मोटर है, बैंक - बैलेंस है.... ! तुम्हारे पास क्या है ?" पैंतीस साल पहले एक महानायक के भारी-भरकम संवाद पर हावी हो गया था एक छोटा सा वाक्य, "मेरे पास माँ है !" पीढियां बदल गयी लेकिन दीवार फ़िल्म के शशि कपूर के उस डायलोग की तासीर आज भी उतनी ही सिद्दत से महसूस की जा सकती है। सच में, माँ के दूध से बढ़ कर कोई मिठाई और माँ के आँचल से बढ़ कर कोई रजाई नहीं होती। "मातृ देवो भवः !"[6]
  • मां में छिपी है सृष्टि
मां शब्द में संपूर्ण सृष्टि का बोध होता है। मां के शब्द में वह आत्मीयता एवं मिठास छिपी हुई होती है, जो अन्य किसी शब्दों में नहीं होती। इसका अनुभव भी एक मां ही कर सकती है। मां अपने आप में पूर्ण संस्कारवान, मनुष्यत्व व सरलता के गुणों का सागर है। मां जन्मदाता ही नहीं, बल्कि पालन-पोषण करने वाली भी है।[5]
  • मां है ममता का सागर
मां तो ममता की सागर होती है। जब वह बच्चे को जन्म देकर बड़ा करती है तो उसे इस बात की खुशी होती है, उसके लाड़ले पुत्र-पुत्री से अब सुख मिल जाएगा। लेकिन मां की इस ममता को नहीं समझने वाले कुछ बच्चे यह भूल बैठते हैं कि इनके पालन-पोषण के दौरान इस मां ने कितनी कठिनाइयां झेली होगी।[5]

कैसे बनाएँ इस दिन को यादगार

  • सुबह उठते ही अपनी मां को इस दिन की बधाई दें। यदि आपको उनके हाथ का भोजन बहुत पंसद है, और खाना बनाना उनका शौक़ भी है, तो उन्हें नए और स्वादिष्ट व्‍यंजन की एक किताब व डिनर टेबल गिफ़्ट सेट जैसा कुछ तौफा दें।
  • यदि उन्हें संगीत का शौक़ है, तो उनके पसन्दीदा गानों व संगीत की कोई डीवीडी व कैसेट् उपहार में दें, जिससे व ख़ाली समय में घर का काम करते समय सुन सकें।
  • आए दिन छोटे होते घरों को देखते हुए आप उन्हें एक `होम गार्डन' भी उपहार में दे सकते हैं। ये छोटा बगीचा घर की रौनक भी बढ़ाएगा और आपकी मां को व्यस्त भी रखेगा। सुन्दर पौधे घर में बेहतर वातावरण भी बनाए रखेगा।
  • आपका घर व किचन एक ऐसा स्थान है जहाँ आपकी मां अधिक समय बिताती हैं। तो इस अवसर पर आप ड्राइंग रूम और बेडरूम के साथ साथ किचन को भी अच्छे से सज़ा सकते हैं।
  • उन्हें कहीं बाहर घुमाने ले जाएँ। और यदि किसी नज़दीकी जगह पर घूमने का कार्यक्रम बना सकते हों, तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है। मूड़ बदलने के साथ-साथ आपकी पिकनिक ट्रिप उन्हें प्रकृति के क़रीब लाएगी और वे बेहतर महसूस करेगीं।
इस प्रकार आप अपनी मां के लिए ये मातृ दिवस (मदर्स डे) स्पेशल बना सकते हैं। अगाथा क्रिस्टी के शब्दों में, एक शिशु के लिए उसकी मां का लाड़ - प्यार दुनिया की किसी भी वस्तु के सामने अतुलनीय है। इस प्रेम की कोई सीमा नहीं होती और ये किसी क़ानून को नहीं मानता।

Thursday, May 10, 2012

मंदिर में घंटी क्यों लगी होती है ?


अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो सबसे पहले घंटी जरुर बजाते है,और घर में भी पूजा करने पर घंटी बजाते है. क्या कभी सोचा है मंदिर में घंटी क्यों लगी होती है ?

मंदिरों से हमेशा घंटी की आवाज आती रहती है. सामान्यत: सभी श्रद्धालु मंदिरों में लगी घंटी अवश्य बजाते हैं. घंटी की आवाज हमें ईश्वर की अनुभूति तो कराती है साथ ही हमारे स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है. घंटी आवाज से जो कंपन होता है उससे हमारे शरीर पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. घंटी की आवाज से हमारा दिमाग बुरे विचारों से हट जाता है और विचार शुद्ध बनते हैं. इसके पीछे ऋषियों का नाद विज्ञान हैं.

पुरातन काल से ही मंदिरों में घंटियां से लगाई जाती हैं. सुबह-शाम मंदिरों में जब पूजा-आरती की जाती है तो छोटी घंटियों, घंटों के अलाव घडिय़ाल भी बजाए जाते हैं. इन्हें विशेष ताल और गति से बजाया जाता है. इन लय युक्त तरंगौं का प्रभाव व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पडता है ऐसा माना जाता है कि घंटी बजाने से मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति के देवता भी चैतन्य हो जाते हैं, जिससे उनकी पूजा प्रभावशाली तथा शीघ्र फल देने वाली होती है.

पुराणों के अनुसार मंदिर में घंटी बजाने से हमारे कई पाप नष्ट हो जाते हैं. जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब जो नाद (आवाज) था, वहीं स्वर घंटी की आवाज से निकलती है. यही नाद ओंकार के उच्चारण से भी जाग्रत होता है. घंटे को काल का प्रतीक भी माना गया है. धर्म शास्त्रियों के अनुसार जब प्रलय काल आएगा तब भी इसी प्रकार का नाद प्रकट होगा.स्कंद पुराण के अनुसार मंदिर में घंटी बजाने से मानव के सौ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं.

मंदिरों में घंटी बजाने का वैज्ञानिक कारण भी है. अधिक भीड़ के समय भक्तों को संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है,जब घंटी बजाई जाती है तो उससे वातावरण में कंपन उत्पन्न होता है जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक जाता है. इस कंपन की सीमा में आने वाले जीवाणु, विषाणु आदि सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं तथा मंदिर का तथा उसके आस-पास का वातावरण शुद्ध बना रहता

Monday, May 7, 2012

विश्व रेडक्रॉस दिवस (8 may)



विश्व रेडक्रॉस दिवस (WORLD RED CROSS DAY) अन्तर्राष्ट्रीय स्वंयसेवक दिवस के रूप में मनाया जाता है। पिछले 150 वर्षों से पूरे विश्व में रेडक्रॉस के स्वंय सेवक असहाय एवं पीड़ित मानवता की सहायता के लिए काम करते आ रहे हैं। भारत में वर्ष 1920 में पार्लियामेंट्री एक्ट के तहत भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी का गठन हुआ, तब से रेडक्रॉस के स्वंय सेवक विभिन्न प्रकार के आपदाओं में निरंतर निस्वार्थ भावना से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। अन्तर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस ने इस वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस का 'Find the Volunteer in side you' (अपने अन्दर के स्वयं सेवक को पहचानें) का नारा दिया है।
विश्व के लगभग दो सौ देश किसी एक विचार पर सहमत हैं तो वह है रेडक्रॉस के विचार। युद्ध के मैदान में घायल सैनिकों की चिकित्सा के साथ प्रकृति के महाविनाश के बीच फंसे लोगों की मदद के लिए हमेशा डटा रहता है रेडक्रॉस।
पीड़ित मानवता की सेवा बिना भेदभाव के करते रहने का विचार देने वाले तथा रेडक्रॉस अभियान को जन्म देने वाले महान मानवता प्रेमी जीन हेनरी डयूनेन्ट का जन्म 8 मई 1828 में हुआ था। उनके जन्म दिवस 8 मई को विश्व रेडक्रॉस दिवस के रूप में पूरे विश्व में मनाया जाता है। उन्होंने समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया और पूरे विश्व के लोगों को मानवतावादी सेवक के रूप में स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। सेवा कार्य के लिए उनके द्वारा गठित सोसायटी को रेडक्रॉस का नाम दिया गया। वर्तमान में विश्व के 186 देशों में रेडक्रॉस सोसायटी कार्य कर रही है। वर्ष 1901 में हेनरी डयूनेंट को उनके मानव सेवा के कार्यों के लिए पहला नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
युद्ध में घायल सैनिकों की स्थिति से विचलित हेनरी डयूनेन्ट ने 9 फरवरी 1863 को जेनेवा में पांच लोगों की एक कमेटी बनाई। हेनरी की इस परिकल्पना का नाम था 'इंटरनेशनल कमेटी फॉर रिलीफ टू द उन्डेड'। उसी वर्ष अक्टूबर में जेनेवा में ही एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इसमें 18 विभिन्न देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसी में रेडक्रॉस को अमली जामा पहनाने का मसौदा तैयार किया गया।
इस संस्था की पहचान के लिए सफेद पट्टी पर लाल रंग के क्रास चिह्न को मान्यता दी गई। आज यह चिह्न पूरे विश्व में पीड़ित मानवता की सेवा का प्रतीक बन गया है। इसके साथ यह भी अतिमहत्त्वपूर्ण है कि विश्व का पहला ब्लड बैंक रेडक्रॉस की पहल पर अमेरिका में 1937 में खुला। आज विश्व के अधिकांश ब्लड बैंकों का संचालन रेडक्रॉस एवं उसकी सहयोगी संस्थाओं के द्वारा किया जाता है। रेडक्रॉस द्वारा चलाए गए रक्तदान जागरूकता अभियान के कारण ही आज थैलेसिमिया, कैंसर, एनीमिया जैसी अनेक जानलेवा बीमारियों से हजारों लोगों की जान बच रही है।




"अहो! ये देवर्षि नारद हैं, जो वीणा बजाते हैं, हरिगुण गाते, मस्त दशा में तीनों लोकों में घूम कर दु:खी संसार को आनंदित करते हैं।" [1]

खड़ी शिखा, हाथ में वीणा, मुख से 'नारायण' शब्द का जाप, पवन पादुका पर मनचाहे वहाँ विचरण करने वाले नारद से सभी परिचित हैं।श्रीकृष्ण देवर्षियों में नारद को अपनी विभूति बताते हैं [2]। वैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतियाँ, सभी शास्त्रों में कहीं ना कहीं नारद का निर्देश निश्चित रूप से होता ही है। ऋग्वेद मंडल में 8-9 के कई सूक्तों के दृष्टा नारद हैं। अथर्ववेद, ऐतरेय ब्राह्मण, मैत्रायणी संहिताआदि में नारद का उल्लेख है।

पूर्व कल्प में नारद 'उपबर्हण' नाम के गंधर्व थे। उन्हें अपने रूप पर अभिमान था। एक बार जब ब्रह्मा की सेवा में अप्सराएँ और गंधर्व गीत और नृत्य से जगत्सृष्टा की आराधना कर रहे थे, उपबर्हण स्त्रियों के साथ श्रृंगार भाव से वंहा आया। उपबर्हण का यह अशिष्ट आचरण देख कर ब्रह्मा कुपित हो गये और उन्होंने उसे 'शूद्र योनि' में जन्म लेने का शाप दे दिया। शाप के फलस्वरूप वह 'शूद्रा दासी' का पुत्र हुआ। माता पुत्र साधु संतों की निष्ठा के साथ सेवा करते थे। पाँच वर्ष का बालक संतों के पात्र में बचा हुआ झूठा अन्न खाता था, जिससे उसके हृदय के सभी पाप धुल गये। बालक की सेवा से प्रसन्न हो कर साधुओं ने उसे नाम जाप और ध्यान का उपदेश दिया। शूद्रा दासी की सर्पदंश से मृत्यु हो गयी। अब नारद जी इस संसार में अकेले रह गये। उस समय इनकी अवस्था मात्र पाँच वर्ष की थी। माता के वियोग को भी भगवान का परम अनुग्रह मानकर ये अनाथों के नाथ दीनानाथ का भजन करने के लिये चल पड़े। एक दिन वह बालक एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान लगा कर बैठा था कि उसके हृदय में भगवान की एक झलक विद्युत रेखा की भाँति दिखायी दी और तत्काल अदृश्य हो गयी। उसके मन में भगवान के दर्शन की व्याकुलता बढ़ गई, जिसे देख कर आकाशवाणी हुई - हे दासीपुत्र! अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद रूप में मुझे पुन: प्राप्त करोगे।' समय बीतने पर बालक का शरीर छूट गया और कल्प के अंत में वह ब्रह्म में लीन हो गया।

समय आने पर नारद जी का पांचभौतिक शरीर छूट गया और कल्प के अन्त में ये ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए।

नारद मुनि, हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के 'सात मानस' पुत्रों में से एक हैं । उन्होंने कठिन तपस्या से 'ब्रह्मर्षि' पद प्राप्त किया है । वे भगवान विष्णु के प्रिय भक्तों में से एक माने जाते हैं।




महायोगी नारद जी ब्रह्मा जी के मानसपुत्र हैं। वे प्रत्येक युग में भगवान की भक्ति और उनकी महिमा का विस्तार करते हुए लोक-कल्याण के लिए सर्वदा सर्वत्र विचरण किया करते हैं। भक्ति तथा संकीर्तन के ये आद्य-आचार्य हैं। इनकी वीणा भगवन जप 'महती' के नाम से विख्यात है। उससे 'नारायण-नारायण' की ध्वनि निकलती रहती है। इनकी गति अव्याहत है। ये ब्रह्म-मुहूर्त में सभी जीवों की गति देखते हैं और अजर–अमर हैं। भगवद-भक्ति की स्थापना तथा प्रचार के लिए ही इनका आविर्भाव हुआ है।

कार्य

नारद के अगणित कार्य हैं। भृगु कन्या लक्ष्मी का विवाह विष्णु के साथ करवाया, इन्द्र को समझा बुझाकर उर्वशी का पुरुरवा के साथ परिणय सूत्र कराया, जालंधर का विनाश करवाया, कंसको आकाशवाणी का अर्थ समझाया और बाल्मीकि को रामायण की रचना करने की प्रेरणा दी। व्यास जी से भागवत की रचना करवायी, प्रह्लाद और ध्रुव को उपदेश देकर महान भक्त बनाया, बृह्स्पति और शुकदेव जैसों को उपदेश दिया और उनकी शंकाओं का समाधान किया, इन्द्र, चन्द्र, विष्णु, शंकर, युधिष्ठिर, राम, कृष्ण आदि को उपदेश देकर कर्तव्याभिमुख किया। भक्ति का प्रसार करते हुए वे अप्रत्यक्ष रूप से भक्तों का सहयोग करते रहते हैं। ये भगवान के विशेष कृपापात्र और लीला-सहचर हैं। जब-जब भगवान का आविर्भाव होता है, ये उनकी लीला के लिए भूमिका तैयार करते हैं। लीलापयोगी उपकरणों का संग्रह करते हैं और अन्य प्रकार की सहायता करते हैं इनका जीवन मंगल के लिए ही है। ये स्वयं वैष्णव हैं और वैष्णवों के परमाचार्य तथा मार्गदर्शक हैं।

देवर्षि नारद


देवर्षि नारद, व्यास, बाल्मीकि तथा महाज्ञानी शुकदेव आदि के गुरु हैं। श्रीमद्भागवत, जो भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य का परमोपदेशक ग्रंथ-रत्न है तथा रामायण, जो मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पावन, आदर्श चरित्र से परिपूर्ण है, देवर्षि नारदजी की कृपा से ही हमें प्राप्त हो सकें हैं। इन्होंने ही प्रह्लाद, ध्रुव, राजा अम्बरीष आदि महान भक्तों को भक्ति मार्ग में प्रवृत्त किया। येभागवत धर्म के परम-गूढ़ रहस्य को जानने वाले- ब्रह्मा, शंकर, सनत्कुमार, महर्षि कपिल, स्वयंभुव मनु आदि बारह आचार्यों में अन्यतम हैं। देवर्षि नारद द्वारा विरचित भक्तिसूत्र बहुत महत्त्वपूर्ण है। नारदजी को अपनी विभूति बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण श्रीमद् भागवत गीता के दशम अध्याय में कहते हैं- अश्वत्थ: सर्ववूक्षाणां देवर्षीणां च नारद:।


व्यक्तित्व


नारद श्रुति - स्मृति, इतिहास, पुराण, व्याकरण, वेदांग, संगीत, खगोल-भूगोल, ज्योतिष, योग आदि अनेक शास्त्रों में पारंगत थे। नारद आत्मज्ञानी, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, त्रिकाल ज्ञानी, वीणा द्वारा निरंतर प्रभु भक्ति के प्रचारक, दक्ष, मेधावी, निर्भय, विनयशील, जितेन्द्रिय, सत्यवादी, स्थितप्रज्ञ, तपस्वी, चारों पुरुषार्थ के ज्ञाता, परमयोगी, सूर्य के समान, त्रिलोकी पर्यटक, वायु के समान सभी युगों, समाजों और लोकों में विचरण करने वाले, वश में किये हुए मन वाले. नीतिज्ञ, अप्रमादी, आनंदरत, कवि, प्राणियों पर नि:स्वार्थ प्रीति रखने वाले, देव, मनुष्य, राक्षस सभी लोकों में सम्मान पाने वाले देवता तथापि ऋषित्व प्राप्त देवर्षि थे।




एक बार नारद को कामदेव पर विजय प्राप्त करने का गर्व हुआ। उनके इस गर्व का खण्डन करने के लिए भगवान ने उनका मुँह बन्दर जैसा बना दिया। नारद का स्वभाव 'कलहप्रिय' कहा गया है। व्यवहार में खटपटी व्यक्ति को, एक दूसरे के बीच झगड़ा लगाने वाले व्यक्ति को हम नारद कहते हैं। परंतु नारद कलहप्रिय नहीं वरन वृतांतों का वहन करने वाले एक विचारक थे।

नारद के ग्रंथ

नारद पांचरात्र

नारद के भक्तिसूत्र

नारद महापुराण,

बृहन्नारदीय उपपुराण-संहिता-(स्मृतिग्रंथ)

नारद-परिव्राज कोपनिषद

नारदीय-शिक्षा के साथ ही अनेक स्तोत्र भी उपलब्ध होते हैं। देविर्षि नारद के सभी उपदेशों का निचोड़ है -




सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तितै: भगवानेव भजनीय:। अर्थात सर्वदा सर्वभाव से निश्चित होकर केवल भगवान का ही ध्यान करना चाहिए।


भक्त नारद

देवर्षि नारद भगवान के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। ये भगवान की भक्ति और माहात्म्य के विस्तार के लिये अपनी वीणा की मधुर तान पर भगवद्गुणों का गान करते हुए निरन्तर विचरण किया करते हैं। इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इनके द्वारा प्रणीत भक्तिसूत्र में भक्ति की बड़ी ही सुन्दर व्याख्या है। अब भी ये अप्रत्यक्षरूप से भक्तों की सहायता करते रहते हैं। भक्त प्रह्लाद, भक्त अम्बरीष, ध्रुव आदि भक्तों को उपदेश देकर इन्होंने ही भक्तिमार्ग में प्रवृत्त किया। इनकी समस्त लोकों में अबाधित गति है। इनका मंगलमय जीवन संसार के मंगल के लिये ही है। ये ज्ञान के स्वरूप, विद्या के भण्डार, आनन्द के सागर तथा सब भूतों के अकारण प्रेमी और विश्व के सहज हितकारी हैं। हिन्दू संस्कृति के दो अमूल्य ग्रंथ रामायण और भागवत के प्रेरक नारद का जन्म लोगों को सन्मार्ग पर मोड़ कर भक्ति के मार्ग पर खींचकर, विश्वकल्याण के लिए हुआ था।

Saturday, May 5, 2012

कौन से पुष्प, किस देवता को चढाते है ?

फूल सुंदरता के प्रतीक हैं, जो जीवन में उत्साह, उल्लास ओर उमंग भरते हैं। फूलों की सुगंध और सौंदर्य से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं ऐसी मान्यता है कि भगवान के प्रिय पुष्प अर्पित करने से वे जल्दी प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनावांछित फल प्रदान करते हैं।यही वजह है कि पूजा-अर्चना, व्रत-उपवास या विभिन्न पर्वों पर अपने-अपने इष्ट को पुष्प अर्पित करने का विधान है।

भगवान की पूजा-अर्चना में फूल अर्पित करना अति आवश्यक माना गया है। सभी मांगलिक कार्य और पूजन कर्म में फूलों का विशेष स्थान होता है। सभी देवी-देवताओं को अलग-अलग फूल प्रिय हैं। साथ ही कुछ फूल ऐसे है जो नहीं चढ़ाएं जाते। इसी वजह से बड़ी सावधानी से पूजा आदि के लिए फूलों का चयन करना चाहिए।

१. श्रीगणेश - पद्मपुराण, आचार रत्न में लिखा है कि 'न तुलस्या गणाधिपम्‌' अर्थात गणेशजी को तुलसी छोड़कर सभी पत्र-पुष्प प्रिय हैं! गणपतिजी को दूर्वा अधिक प्रिय है। अतः सफेद या हरी दूर्वा चढ़ाना चाहिए। दूर्वा की फुनगी में तीन या पाँच पत्ती होना चाहिए। भगवान गणेश को गुड़हल का लाल फूल विशेष रूप से प्रिय होता है। इसके अलावा चाँदनी, चमेली या पारिजात के फूलों की माला बनाकर पहनाने से भी गणेश जी प्रसन्न होते हैं।

२. शंकरजी- भगवान शंकर को धतूरे के पुष्प, हरसिंगार, व नागकेसर के सफेद पुष्प, सूखे कमल गट्टे, कनेर, कुसुम, आक, कुश आदि के पुष्प चढ़ाने का विधान है।शिवजी की पूजा में मालती, कुंद, चमेली, केवड़ा के फूल वर्जित किए गए हैं।भगवान शंकर पर फूल चढ़ाने का बहुत अधिक महत्व है। तप, शील, सर्वगुण संपन्न वेद में निष्णात किसी ब्राह्मण को सौ सुवर्ण दान करने पर जो फल प्राप्त होता है, वह शिव पर सौ फूल चढ़ा देने से प्राप्त हो जाता है।

जैसे दस सुवर्ण दान का फल एक आक के फूल को चढ़ाने से मिलता है, उसी प्रकार हजार आक के फूलों का फल एक कनेर से और हजार कनेर के बराबर एक बिल्व पत्र से मिलता है। समस्त फूलों में सबसे बढ़कर नीलकमल होता है।

३. सूर्य नारायण- इनकी उपासना कुटज के पुष्पों से की जाती है। इसके अलावा कनेर, कमल, चंपा, पलाश, आक, अशोक आदि के पुष्प भी प्रिय हैं। सूर्य उपासना में अगस्त्य के फूलों का उपयोग नहीं करना चाहिए।

४. भगवती गौरी- शंकर भगवान को चढऩे वाले पुष्प मां भगवती को भी प्रिय हैं। इसके अलावा बेला, सफेद कमल, पलाश, चंपा के फूल भी चढ़ाए जा सकते हैं।

५. श्रीकृष्ण-
 अपने प्रिय पुष्पों का उल्लेख महाभारत में युधिष्ठिर से करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- मुझे कुमुद, करवरी, चणक, मालती, नंदिक, पलाश व वनमाला के फूल प्रिय हैं।

६. लक्ष्मीजी-
 इनका सबसे अधिक प्रिय पुष्प "कमल" है।पुष्पों में कमल का विशेष स्थान है। कमल का फूल सभी देवी-देवताओं को अतिप्रिय है। कमल की सुंदरता की महिमा इसी बात से सिद्ध होती है कि भगवान के नेत्रों की तुलना कमल के फूल से की जाती है।

कमल कीचड़ में उगता है और उससे ही पोषण लेता है, लेकिन हमेशा कीचड़ से अलग ही रहता है। कमल का फूल पूर्ण विकास दर्शाता है. सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन किस प्रकार जिया जाए. संसाररूपी कीचड़ में रहते हुए भी हमें किस तरह रहना चाहिए यह शिक्षा हम कमल से ले सकते हैं।

कमल की आठ पंखुडिय़ां मनुष्य के अलग-अलग 8 गुणों की प्रतीक हैं, ये गुण हैं दया, शांति, पवित्रता, मंगल, निस्पृहता, सरलता, ईर्ष्या का अभाव और उदारता। इसका आशय यही है कि मनुष्य जब इन गुणों को अपना लेता है तब वह भी ईश्वर को कमल के फूल के समान प्रिय हो जाता है।

७. विष्णुजी-
 इन्हें कमल, मौलसिरी, जूही, कदम्ब, केवड़ा, चमेली, अशोक, मालती, वासंती, चंपा, वैजयंती के पुष्प विशेष प्रिय हैं।

 प्रात: काल स्नानादि के बाद भी देवताओं पर चढ़ाने के लिए पुष्प तोड़ें या चयन करें। ऐसा करने पर भगवान प्रसन्न होते हैं।

                                             भगवान को कौन से पुष्प नहीं चढ़ाये 

विष्णु और भगवान शिव को केवल केतकी (केवड़े) का निषेध है।  सूर्य और श्रीगणेश के अतिरिक्त सभी देवी-देवताओं को बिल्व पत्र चढ़ाएं जा सकते हैं। सूर्य और श्री गणेश को बिल्व पत्र न चढ़ाएं। 'गणेश तुलसी पत्र दुर्गा नैव तु दूर्वाया' अर्थात गणेशजी की तुलसी पत्र और दुर्गाजी की दूर्वा से पूजा न करें।

                                        किस तरह के फूल पूजा में नहीं चढाने चाहिये?
कीड़े लगे फूल, बासी फूल भगवान को न चढ़ाएं।

* बिखरे या पेड़ से जमीन पर गिरे फूल भी देव पूजा में ना चढ़ाएं।

* कली या अधखिले फूल भी अर्पित न करें।

* भगवान पर चढ़ा, उल्टे हाथ में रखा, धोती के पल्ले में बांधकर लाया और पानी से धोया फूल भी न चढ़ाएं।

पौधे पर जिस स्थिति में फूल खिलता है, उसी स्थिति में सीधे हाथ से भगवान को चढ़ाएं।

फूलों को किसी टोकरी में तोड़कर लाएं।

* सूखे फूल न चढ़ाएं।.

बिना नहाए पूजा के लिए फूल कभी ना तोड़े।किसी भी देवता के पूजन में केतकी के पुष्प नहीं चढ़ाए जाते।  
एक अन्य बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है और वह यह कि कमल और कुमुद के पुष्प ग्यारह से पंद्रह दिन तक भी बासी नहीं होते। चंपा की कली के अलावा किसी भी पुष्प की कली देवताओं को अर्पित नहीं की जाती। केतकी के पुष्प किसी भी पूजन में अर्पित नहीं किए जाते। कुशा से मूर्ति पर जल न छिड़के।

                                                                     सार
सबसे महत्व की बात यह है हम जो भी चढ़ाये उसमे भाव हो, बिना भाव के कोई भी चीज करना बेकार है. "पत्रं पुष्पं फलं , तोयम , माय भक्त्या प्रयाच्चाती इअदहम भक्त्य्पर्हत्म्श्नामी प्रयात्मनाह" जो भी मुझे प्रेम  से फूल, फल, जल अर्पित करता है मैं उसे स्वीकारता हूँ. और हमारा सुन्दर मन ही सुमन अर्थात पुष्प है. इसी सुन्दर मन को हम बड़े भाव से परमात्मा को अर्पित करे.भगवान इस सुमन से सबसे ज्यादा प्रसन्न होते है.


सात्विक भोजन क्यों जरुरी है ?

कहते है जैसा अन्न वैसा मन,अर्थात हम जो कुछ भी खाते है वैसा ही हमारा मन बन जाता है.जैसा हमारा मन होगा.अन्न चरित्र निर्माण करता है.इसलिए हम क्या खा रहे है इस बात को सदा ध्यान रखना चाहिये.

अक्सर देखा जाता है कि लोग भोजन के समय टीवी देखते रहते हैं या अखबार पढ़ते रहते हैं या कुछ और करते रहते हैं लेकीन ऐसा करना उचित नहीं,क्योंकि मन में दो चीजे एक साथ नहीं बसती , मन एक समय में एक विषय को पकड़ता है और हम सम्पूर्ण संसार को एक साथ भरना चाहते हैं जो संभव नहीं और यहीं हम भूल कर जाते हैं.छोटी-छोटी बातें हैं जो गंभीर असर हम सब के जीवन पर डालती हैं.

प्रकृति से हम जो कुछ भी ग्रहण करते हैं जैसे  भोज्य पदार्थ, पेय पदार्थ, वायु , पांच ज्ञानेन्द्रियों से जो कुछ भी हमारा मन प्राप्त करता है, कर्म इन्द्रियों से हम जो कुछ भी प्राप्त करते हैं,और मन में संगृहीत सूचनाओं के मनन से जैसा भाव मन में उठता है. इन सब से हमारे अंदर का गुण समीकरण बदलता है और गुण समीकरण में आया परिवर्तन ही हमारे वर्तमान को चलाता है.

जैसा गुण समीकरण अन्दर होगा ,वैसे विचार मन-बुद्धि में उठेंगे, जैसे बिचार उठते हैं वैसे हम कर्म करते हैं,जैसे हम कर्म करते हैं, वैसा फल हमें मिलता है , और कर्म के आधार पर हमारा अगला जन्म भी आधारित होता है, भोजन बनाना, भोजन सामग्री, भोजन बनानें वाले और करनें वाले की मन की स्थितियां ऎसी कुछ बातें हैं जिनको हमें ध्यान रखना चाहिए.

भोजन के स्वाद 
भोजन के छै: स्वाद होते है.

१. - मधुर स्वाद २. - खट्‌टा स्वाद ३. -नमकीन स्वाद ४. - तीखा स्वाद ५. - कड़वा स्वाद ६. - कसैला स्वाद

१.- मधुर स्वाद  - मधुर स्वाद वाले खाद पदार्थ सर्वाधिक पुष्टिकर माने जाते हैं ।वे शरीर से उन महत्वपूर्ण विटामिनों एवं खनिज-लवणों को ग्रहण करते हैं जिसका प्रयोग शर्करा को पचाने के लिये किया जाता है । इस श्रेणी में आने वाले खाद पदार्थों में समूचे अनाज के कण, रोटी, पास्ता, चावल, बीज एवं बादाम हैं.
२. - खट्‌टा स्वाद - छाछ, खट्‌टी मलाई, दही एवं पनीर है अधिकांश अधपके फल भी खट्‌टे होते हैं । खट्‌टे खाद्पदार्थ का सेवन करने से हमारी भूख बढ़ती है यह आपके लार एवं पाचक रसों का प्रवाह तेज करती है । खट्‌टे भोजन का अति सेवन करने से हमारे शरीर में दर्द तथा ऐंठन की अधिक सम्भावना रहती है.
३. - नमकीन स्वाद - नमक आदि 
४. - तीखा स्वाद - प्याज, अदरक, सरसों, लाल मिर्च.
५. - कड़वा स्वाद -  हरी सब्जियों, चाय,काफी आदि. 
६. - कसैला स्वाद- अजवाइन, खीरा, बैंगन,सेव, रूचिरा, झड़बेरी, अंगूर एवं नाशपाती भी कसैले होते हैं.

भोजन के प्रकार

भोजन तीन प्रकार के हो सकते हैं - "सात्विक", "राजसिक" एवं "तामसिक". 
१. सात्विक - सात्विक भोजन सदा ही ताज़ा पका हुआ, सादा, रसीला, शीघ्र पचने वाला, पोषक, चिकना, मीठा एवं स्वादिष्ट होता है. यह मस्तिष्क की उर्जा में वृद्धि करता है और मन को प्रफुल्लित एवं शांत रखता है, सोचने-समझने की शक्ति को और भी स्पष्ट बनाता है. सात्विक भोजन शरीर और मन को पूर्ण रूप से स्वस्थ रखने में बहुत अधिक सहायक है.जो अपने अच्छे-बुरे स्वास्थ्य के लिए अच्छे और मध्यम भोजन को चुनना चाहते हैं अर्थात जो आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक तीनो प्रकार से अच्छा स्वास्थ्य पाना चाहते हैं उन्हे सात्विक भोजन करना चाहिए।

बादाम, शहद ताजे फल, दूध, गाय का दूध, घी, पके हुए ताजे फल, बादाम, खजूर, सभी अंकुरित अन्न व दालें, टमाटर, परवल, तोरई, करेला जैसी सब्जियां, पत्तेदार साग सात्विक मानी गयीं हैं. घर में सामान्यतः प्रयोग किये जाने वाले मसाले जैसे हल्दी, अदरक, इलाइची, धनिया, सौंफ और दालचीनी सात्विक होते हैं.

२. राजसिक - जो लोग चाहते हैं कि वो सिर्फ मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ बने उन्हे राजसिक भोजन करना चाहिए।कड़वा, खट्टा, नमकीन, तेज़, चरपरा और सूखा होता है. पूरी, पापड़, बिजौड़ी जैसे तले हुए पदार्थ , तेज़ स्वाद वाले मसाले, मिठाइयाँ, दही, बैंगन, गाजर-मूली, उड़द, नीबू, मसूर, चाय-कॉफी, पान राजसिक भोजन के अर्न्तगत आते हैं.

३. तामसिक - जो लोग चाहते हैं कि भोजन करने से सिर्फ उनका शरीर ताकतवर और मजबूत बने उन लोगों को तामसिक भोजन करना चाहिए। बासी, जूठा, ठंडा, अधपका, गंधयुक्त आहार लेगा पुराने, पुन: पकाये हुए, कृत्रिम, अति तले हुए, चर्बीदार या भारी भोजन जैसे - मांस, मछली और अन्य सी-फ़ूड, वाइन, लहसुन, प्याज और तम्बाकू, पेस्ट्री, पिज्जा, बर्गर, ब्रेड, चॉकलेट, सॉफ्ट ड्रिंक, तंदूरी रोटी, रुमाली रोटी, नान, बेकरी उत्पाद, तम्बाकू, शराब, डिब्बाबंद व फ्रोज़न फ़ूड, ज़रूरत से ज्यादा चाय-कॉफी, केक, अंडे, जैम, कैचप, नूडल्स, चिप्स समेत सभी तले हुए पदार्थ होते हैं।  ये शरीर में गरमी पैदा करते हैं. इसलिए इन्हें तामसिक भोजन की श्रेणी में रखा गया है। 

कई धर्मो में वैष्णवजन प्याज लहसुन का उपयोग नहीं करते. प्याज शरीर को लाभ पहुंचाने के हिसाब से चाहे कितना ही लाभकारी और गुणकारी क्यों न हो लेकिन मानसिक और आध्यात्मिक नज़रिये से यह एक तेज और निचले दर्जे का तामसिक भोजन का पदार्थ है।दोनों ही अपना असर गरमी के रूप में दिखाते हैं, शरीर को गरमी देते हैं जिससे व्यक्ति की काम वासना में बढ़ोतरी होते है। ऐसे में उसका मन अध्यात्म से भटक जाता है।इनकी तासीर या गुणों के कारण ही इनका त्याग किया गया है.इसी तरह से मांस खाने से शरीर में मांस भले ही बढ़ जाए लेकिन उससे मानसिक ओर आध्यात्मिक स्वास्थ्य की आशा कभी नही करनी चाहिए।

राजसी एवं तामसी खादपदार्थ दोनों में एक संतुलित, एक समान मन-शरीर अनुभव को अवलंबित करने की क्षमता नहीं है.|भोजन जितना बासी और ठंडा होगा उतना ही पचने में देर लगेगी. तामसिक भोजन अतिक्रियाशीलता, आलस्य एवं अति निद्रा उत्पन्न करता है. इसलिए इन्द्रियों को सुस्त करते हैं एवं आवेग को तीव्र तथा प्रभावशून्य रखते हैं. 

हमेशा गर्म और ताजा भोजन करने पर जोर दिया जाता है क्योकि अगर भोजन गरम हो तो भोजन की गर्मी और पेट की गर्मी मिलकर उसे जल्दी पचा देती है. इसलिए पेट की अग्नि को हम ‘जठराग्नि’ कहते है और इसीलिए कहा जाता है कि गर्म भोजन करो.क्योंकि भोजन अगर ठंडा हो तो पेट की अकेली गर्मी के आधार पर ही उसका पाचन होता है, तो जो भोजन छः घंटे में पचना होता है वह बारह घंटे में पचेगा और पचने में जितनी देर लगती है उतनी ही ज्यादा देर तक नींद आएगी क्योंकि जब तक भोजन न पच जाये तब तक मस्तिष्क को उर्जा नहीं मिलती क्योंकि मस्तिष्क जो है वह लक्जरी है. अतः सारी उर्जा, सारी शक्ति पहले भोजन को पचाने में लगती है और यही कारण है कि भोजन के बाद नींद मालूम पड़ती है क्योंकि मस्तिष्क को जितनी शक्ति मिलनी चाहिए वह नहीं मिलती.
तामसी भोजन आलस्य बढ़ाता है, राजसी भोजन क्रोध बढ़ाता है और सात्विक भोजन प्रेम बढ़ाता है . शरीर भोजन से ही बना है, इसलिए बहुत कुछ भोजन पर ही निर्भर है.  तामसी प्रेम नहीं कर सकता, वह प्रेम की मांग करता है. उसकी शिकायत है कि उससे कोई प्रेम नहीं करता.सत्व प्रेम देता है.

Friday, May 4, 2012

भक्त प्रह्लाद जी

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की "चतुर्दशी को नरसिंह जयंती" के रूप में मनाते है.इस दिन भगवान ने नरसिंह अवतार लेकर प्रहलाद की रक्षा कि थी और हिरण्यकश्यपु का वध किया था.

पूजा कि विधि - इस तिथि पर व्रत रहकर मध्यान्ह के समय वैदिक मंत्रो के उच्चारण से स्नान करना चाहिये भगवान नरसिहं शक्ति और पराक्रम के देवता है पूजा के स्थान को गोवर से लीपकर कलश में ताम्बे इत्यादि डालकर उसमे अष्टदल कमल बनाना चाहिये फिर शक्ति के अनुसार गोदान तिल स्वर्ण वस्त्र दान करना चाहिये.  

नरसिंहदेव कथा - श्री कश्यप की पत्नी दिति से दो पुत्र उत्पन्न हुए - हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु. दोनों बड़े क्रूर थे, एक बार जब हिरण्याक्ष पृथ्वी को रसातल में ले गया तब भगवान ने वराह अवतार लेकर उस राक्षस का वध किया. और पृथिवी को रसातल से बाहर ले आये जब उसके भाई हिरण्यकश्यपु को यह पता चला तो वह बहुत क्रोधित हुआ. और वह भगवान विष्णु से द्वेष करने लगा. उसे पता था की विष्णु भगवान बहुत बलशाली है इसलिए उसने उन्हें हराने के लिए ब्रह्मा जी की तपस्या शुरू कर दी.

और बहुत बरसो तक तपस्या करता रहा. उधर इंद्र ने हिरण्याकश्यपु से बदला लेने के लिए उसकी पत्नी कयादु को उसके महलों से उठाकर लाया,जब वह रास्ते में था. तो नारद जी ने रोका और कहा- कि इंद्र ये तुम क्या कर रहे हो? किसी की पत्नी का इस तरह उसके पीछे हरण करना सही नहीं है, और नारदजी कयादु को लेकर अपने आश्रम में चले गए.

कयादु आश्रम में रहने लगी,कयादु उस समय गर्भवती थी. नारदजी ने कहा- जब तक तुम्हारे पति तपस्या से वापस नहीं आ जाते तब तक तुम आश्रम में रहो, आश्रम में रोज श्री हरि की कथा होती, हरि नाम का संकीर्तन होता, कयादु बहुत ध्यान से कथा सुनती, कीर्तन करती, उनका सारा समय इसी प्रकार से बीतेने लगा,समय बीतने पर कयादु ने एक बेटे को जन्म दिया नारद जी ने बेटे का नाम "प्रहलाद" रखा, प्रहलाद को जन्म से पहले ही सत्संग मिला था,अपने माँ के गर्भ में ही भगवान से प्रीति हो गई थी, इसलिए पाँच वर्ष की उम्र में ही उन्हे बहुत ज्ञान  था, श्री हरि के भक्त थे, दिन हो या रात बस उन्हें केवल भगवान की भक्ति से ही काम था. 

उधर हिरण्याकश्यपु के तप से ब्रम्हा जी प्रसन्न हो गए, और उसे वरदान देने के लिए प्रकट हो गए,हिरण्याकश्यपु ने अमरता का वरदान माँगा. ब्राम्हा जी ने कहा- दुनिया में अमर कोई भी नहीं हो सकता, क्योकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है,

तब हिरण्याकश्यपु ने कहा - तो ठीक है ब्रम्हा जी मुझे वरदान दीजियेगा, कि में न दिन में मरू, न रात में, न सुबह मरू न शाम को, न आकाश में मरू, न धरती पर, न किसी अस्त्र से मरू, न शस्त्र से, न नर से मरू, न पशु-पंछी से,  देव से मरू, न दानव से,  न बारह महीनों में किसी में मरू. ब्रम्हा जी ने वरदान दे दिया.

हिरण्याकश्यपु अपने को अमर समझ कर अपने महलो में आ गया और सारे राज्य में श्री हरि की पूजा बंद कर दी,और स्वंय की पूजा कराने लगा, पर उनके अपने महलों में ही हरि भक्त प्रहलाद जी थे जब हिरण्यकश्यपु को पता चला तो उसने बहुत प्रकार से प्रहलाद को समझाया पर वे नहीं माने.

एक दिन कयादु पति से बोली- प्रहलाद अब पाँच वर्ष के हो गये है,में देखती हूँ ,कभी तो रोते थे,कभी हँसते थे,कभी नाचते है, कभी ताली बजाते, कभी गाते थे.अब उन्हें पढने के लिए पाठशाला भेजना चाहिए, हिरण्याकश्यपु ने तुरंत गुरू शुक्राचार्य के पुत्र  संडा और आमर्क को के पास प्रहलाद को राक्षसी विद्या पढ़ने के लिए पाठशाला में भेज दिया, पर गुरू जी जो भी पढ़ाते उसकी जगह हरि नाम का कीर्तन करते और हरि नाम का ही उपदेश करते, जब  संडा और आमर्क उन्हें समझाते तो उन्हें भी हरि नाम कि महिमा बताते,इससे परेशान होकर उन्होंने प्रहलाद को एक कमरे में बंदकर दिया. 

एक दिन जब वे दोनों किसी काम से बाहर गए तो बाकि के बच्चों ने प्रहलाद को निकाल कर कहा - कि हमारे साथ खेलो, प्रहलाद जी ने कहा- में तो केवल एक ही खेल जानता हूँ तुम सब भी मेरे साथ खेलो, सब बोले - कौन सा खेल?

प्रहलाद जी ने कहा- मेरे गुरु का खेल, हरि कीर्तन, कुछ ही समय में सारे बच्चे भी हरि कीर्तन करने लगे. जब संडा और आमर्क वापस आये और सारे बच्चे भी हरि कीर्तन करते देखा तो उन्हें बहुत गुस्सा आया और वे प्रहलाद हिरण्याकश्यपु के पास ले गए और कहा - कि हम इसे नहीं पढ़ा सकते. और दोनों वापस चले गए.

हिरण्याकश्यपु ने पूछा- प्रहलाद तुम इतने दिनों पाठशाला में रहे, तुमने क्या सीखा हमें बताओ!

प्रहलाद जी ने कहा- पिताजी मेरे गुरुदेव ने जो मुझे सिखाया वो बताऊ या मेने जो सीखा वो बताऊ?

हिरण्याकश्यपु ने कहा- बेटा जो तुमने अपने मन से सीखा है वो बताओ?

प्रहलाद जी ने कहा - पिताजी !  "इस दुनिया में करोडो लोग जन्म लेते है और मर जाते है. सब को अपने-अपनेकर्मो के हिसाब से फल मिलता है, अच्छे कर्मो से स्वर्ग, बुरे कर्मो से नरक मिलता है. जब अच्छे-बुरे कर्म खत्म हो जाते है, तो वापस इसी पृथ्वी पर आना पड़ता है. हर एक प्राणी इसी प्रकार चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता हुआ अपने-अपने कर्मो को भोगता है,यहाँ कोई किसी का अपना नहीं, माता-पिता, भाई-बंधू,पत्नी-पुत्र, सभी एक झूठा सपना है. सगे तो केवल नारायण है कोई कहता है में सुखी हूँ, कोई कहता है- में दुखी हूँ पर वास्तव में व्यक्ति का सबसे बड़ा सुख केवल श्री हरि का नाम है.ये दो अक्षर का शब्द “हरि”में ही जीव का कल्याण है. उनके रूप का ही दिन-रात चिन्तन करने में ही इस निष्सार संसार से उद्धार है इसलिए प्रेम से कहिये-"जय श्री हरि,जय श्री हरि"

जो प्रह्लाद के मुख से अपने शत्रु का नाम सुना तो क्रोध में भर कर.हिरण्याकश्यपु ने कहा- अभी के अभी मेरे शत्रु का नाम छोड़ दे, नहीं तो अपने प्राण छोड़ना पड़ेगे. 

प्रहलाद जी ने कहा- पिता जी!  में अपने प्राण छोड़ दूँगा, पर श्री हरि का नाम नहीं छोड़ सकता. हिरण्याकश्यपु ने जब प्रहलाद की बाते सुनी तो तुरंत अपने सैनिको को बुलाया और प्रहलाद को मारने का आदेश दिया. सैनिको ने प्रहलाद को पहाड की चोटी से नीचे गिराया, जैसे ही प्रहलाद नीचे गिरे स्वयं भगवान ने अपने हाथो में झेल लिया, सर्पो से भारी कोठारी में बंद कर दिया,पर सर्पो ने कुछ भी नहीं किया,  हाथी के पैर के नीचे कुचलवाया,पर हाथी ने कुचले के वजह अपने ऊपर बैठा लिया खौलते तेल के कड़ाई में गिराया, तो तेल तुरंत फूल बन गए, जहर दिया, होलिका आग में लेकर बैठी, तो होलिया ही आग में जल गई पर प्रहलाद का कुछ भी नहीं हुआ,

इन सब से प्रहलाद को कुछ भी नहीं हुआ.हिरण्याकश्यपु ने अपनी तलवार निकाल ली और बोला- प्रहलाद अब मरने के लिए तैयार हो जा! बताओ कहा है तेरा विष्णु, इस तलवार में तेरा काल है, क्या इसमे में भी तेरा विष्णु है.

प्रहलाद जी ने कहा- पिताजी!   "मो मै तो मै, खडग खम्ब मै ,जहाँ देखो तहाँ राम" इस तलवार में, धरती में, आकाश में, इस पृथ्वी के कण-कण में श्री हरि है, पास लगे खम्बे को देखकर, हिरण्याकश्यपु ने कहा-  क्या इस खम्बे में भी तेरा भगवान है?

प्रहलाद जी ने कहा- जी! पिताजी,इस खम्बे में भी मेरा भगवान है झट हिरण्याकश्यपु ने तलवार से उस खम्बे पर प्रहार किया, खम्बे के टुकड़े-टुकड़े हो गये और खम्बे के बीचो-बीच से झूलता हुआ सिहांसन प्रकट हुआ और नरसिंह भगवान प्रकट हो गए,जिनका मुँख तो सिंह के समान था ,और शरीर नर के समान है,बड़े-बड़े नख थे, क्रोध से आँखे लाल-लाल हो रही थी झट भगवान हिरण्याकश्यपु पर लपक पड़े दोनों में युद्ध होने लगा.

भगवान ने हिरण्याकश्यपु की नस-नस ढीली कर दी,अंत में भगवान ने देहलीज पर बैठकर, हिरण्याकश्यपु को अपनी जंघाओं पर लिटा कर अपने नख से छाती चीरकर आँतो को निकालकर अपने गले में डाल ली, तभी  आकाशवाणी हुई, हे हिरण्याकश्यपु इस समय न दिन है न रात, संध्या का समय है, न आकाश है न धरती है, भगवान अपनी जंघाओं में लिए है, न किसी अस्त्र से, न किसी शस्त्र से, अपने नख से मार रहे है, न नर है न पशु-पंछी, नरर्सिंह है, देव है न दानव, बारह महीनों में कोई महीना नहीं, तेरहवा पुरुषोतम महीना है. 

इस तरह भगवान ने उसका प्राणान्तं कर दिया. सारे देवता भगवान की  स्तुति करने लगे. भगवान बहुत क्रोधित हुए और उनके मुख से आग निकलने लगी , उनका गुस्सा किसी भी तरह शांत नहीं हुआ, स्वयं लक्ष्मी जी भी उन्हें शांत नहीं कर सकी सबको समझ में नहीं आ रहा था कि भगवान शांत क्यों नहीं हो रहे, अंत मे सबने प्रह्लाद जी को आगे कर दिया, मानो बता रहे हो जिसने मेरे लिए इतने कष्ट सहे,जिसके लिए मै आया,आप सब देवताओ ने उसे तो पीछे कर दिया और आप सब मेरी स्तुति करने लगे इस लिए भगवान का क्रोध कम होने के वजह और बढ़ गया,

भगवानसिहांसन पर बैठे है, प्रह्लाद जी एक-एक सीढी चढ रहे है, और भगवान की स्तुति करते जा रहे है. जैसे-जैसे प्रह्लाद जी आगे बढ रहे है वैसे-वैसे भगवान शान्तं होते जा रहे है, प्रह्लाद जी को अपनी गोदी मे बैठाकर प्यार से जीभ से चाटने लगे मानो कह हो प्रह्लाद मुझे आने मे देर हो गई. और तेरे पिता हिरण्नायाकश्यपु ने मेरे कारण तुम्हे बहुत कष्ट दिए मुझे माँफ कर दो.

भगवान ने कहा- प्रह्लाद मुझसे कुछ माँग लो,

प्रह्लाद जी ने कहा- भगवान मुझे इस संसार कि कोई भी वस्तु नहीं चाहिए,केवल आपकी भक्ति ही चाहिए है. भगवान ने कहा-प्रह्लाद भक्ति तो मेंने तुम्हे दे ही दी पर इस के साथ मे तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ,

प्रह्लाद जी ने कहा -प्रभु यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते है, तो प्रभु मेरे पिता कि सद्गति हो. भगवान ने कहा- प्रह्लाद तुम अपने पिता की बात करते हो, मेने तो आज से तुम्हारी इक्कीस पीढिंया ही तार दी. इस तरह भगवान प्रह्लाद को दर्शन दे कर अपने लोक को गये, प्रहलाद ने अनेको वर्षों तक राज्य किया.

                                              
सार
इस कथा का सार ये है कि अगर विश्वास है, तो कण-कण मे भगवान है और हर परिस्थिती मे उन पर विश्वास करो भगवान प्रह्लाद के विश्वास पर नहीं हिरण्नायाकश्यपु के विश्वास पर आये थे. क्योकि प्रहलाद जी को तो भगवान को प्रकट करने की आवश्यकता ही नहीं थी उन्हें तो हर जगह दिखायी देते थे हिरण्नायाकश्यपु ने जब प्रह्लाद से पूँछा- कि कहा है तेरा भगवान, इस जलते हुए खम्बे मे भी है और जब प्रह्लाद उस खम्बे से लिपट गए तो हिरण्नायाकश्यपु को विश्वास हो गया कि इस खम्बे मे भगबान है, इसलिये भगवान खम्बे मे से प्रकट हो गए.